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फिल्म समीक्षा/रुस्तम: देशभक्ति के साथ-साथ विवाहोत्तर संबंधों की कहानी

Fri, 12 Aug 2016 02:51 PM IST
रवि बुले/ मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
रवि बुले/ मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला Updated Fri, 12 Aug 2016 02:51 PM IST
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Akshay kumar movie Rustom review

निर्माताः अरुणा भाटिया-नितिन केनी

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निर्देशकः टीनू सुरेश देसाई
सितारेः अक्षय कुमार, इलियाना डिक्रूज, अर्जुन बाजवा, ईशा गुप्ता
रेटिंग ***

थोड़-सी बेवफाई और थोड़ी-सी देशभक्ति। दोनों को मिला कर जो एंटरटेनमेंट बना है, उसी का नाम है रुस्तम। 1959 के चर्चित नानावटी कांड पर आधारित यह कहानी कहने को सच्ची है, मगर अंदाज-ए-बयां फिल्मी है। आप अक्षय कुमार को गंभीर, देशभक्त और वर्दी वाले रोल देखने के इच्छुक हैं तो फिल्म आपके लिए है।

हा, एक्शन का अभाव जरूर थोड़ा खटकेगा। लेकिन अदालत में रचे कुछ चुटीले दृश्य मनोरंजन की भरपाई कर देंगे। फिल्म इस इमोशनल सूत्र को पकड़ कर चलती है कि जब वर्दी वाला नायक देश की रक्षा के लिए जल-थल या आकाश की सीमा पर तैनात है तो उसकी पत्नी को बरगलाना, गलत राह धकेलना अपराध है। नायक कहता है कि इसके लिए मौत की सजा जायज है।
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फिल्म नौसेना के एक पोत पर तैनात अफसर रुस्तम पावरी (अक्षय कुमार) की है, जो एक आदेश के बाद अचानक तय तारीख से पहले लौट आता है। वह पाता है कि पत्नी सिंथिया (इलियाना डिक्रूज) घर पर नहीं है। उसके दोस्त विक्रम मखीजा (अर्जुन बाजवा) के घर गई है। रुस्तम पहुंचता है और कार से बैठे हुए दोनों को बालकनी में अंतरंग देखता है।
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रस्तम लौट आता है। पत्नी सुबह लौटती है और पति को अचानक पाकर घबरा जाती है। पति उसे बेवफाई के सुबूत खत दिखाते हुए निकल जाता है और कुछ ही मिनटों में आप पाते हैं कि विक्रम के घर जाकर रुस्तम ने उसके सीने में तीन गोलियां दाग दीं। वो तीन गोलियां, जिन्होंने देश को हिला दिया। विक्रम को सजा देकर रुस्तम पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करता है। इसके बाद जांच और अदालत की लंबी कार्रवाई। रुस्तम बरी होगा या उसे सजा मिलेगी?

अक्षय के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है

Akshay kumar movie Rustom review

1950-60 के दशक के दिन दिखाने वाली इस फिल्म में पहले हिस्से के घटनाक्रम कहानी की रूपरेखा आपके सामने रख देते हैं। दूसरे हिस्से में अदालत यह तय करने की कोशिश करती है कि न्याय कैसे हो, क्या हो? फिल्म में उस मुकदमे के दौरान मीडिया की भूमिका और रुस्तम के साथ जुड़ी जनभावनाएं दिखाने की कोशिश जरूर है, परंतु उसका ताना-बाना कहानी में घुल-मिल नहीं पाता। वहीं सच्ची घटना पर आधारित कथाक्रम क्रमशः फिल्मी होता जाता है।

न्यायालय में संवादों से हास्य पैदा करने की कोशिश होने लगती है। इन बातों के बीच सुखद यही है कि अक्षय गंभीरता बनाए रखते हैं और बिना वकील के खुद को बचाने के उनके तर्क दर्शक को बांध रहते हैं। अक्षय के लिए यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। वह दिन बीत चुके जब अक्षय को बॉक्स ऑफिस का छुपा रुस्तम कहा जाता था। वह इन दिनों पूरी तरह से बिकाऊ सितारे हैं। फिल्म में इलियाना हर समय इस अहसास में दबी नजर आती हैं कि उन्होंने गलती की। यही उनकी भूमिका भी है। वहीं विक्रम की बहन के रूप में ईशा गुप्ता कुछ दृश्यों में प्रभावी हैं। वह रुस्तम को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना चाहती है। हालांकि कहानी में ईशा का किरदार और अभिनय सरल रेखा-सा है, उसमें विविधता नहीं है।

विवाहेतर संबंध कहानी के केंद्र में होने के बावजूद निर्देशक ने इन्हें ज्यादा विस्तार या व्याख्या नहीं दी। वह भावनाओं पर ज्यादा खेले। अतः फिल्म में कुछ सनसनीखेज ढूंढने की कोशिश बेकार होगी। फिल्म को खूबसूरती से शूट किया गया है। मगर संगीत का पक्ष बेहतर होता तो फिल्म कुछ अधिक फायदे में होती। याद करें कि जिस दौर की कहानी यह कहती है, वह हमारे पार्श्वसंगीत का स्वर्ण युग था।

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