Film Review: त्रिया चरित्र पर बहस करती है फिल्म पिंक
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-निर्माताः शुजित सरकार
-निर्देशकः अनिरुद्द रॉय चौधरी
-सितारेः अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, कृति कुल्हारी, आंद्रिया तरैंग, अंगद बेदी, पियूष मिश्रा
रेटिंगः ***
किसी फिल्म की कामयाबी क्या लड़कियों के स्कर्ट की लंबाई पर होने वाली बहस से सुनिश्चित हो सकती है? स्पष्ट जवाब है, नहीं। इसी तरह स्कर्ट के रूप-आकार-नाप का पैमाना लड़की के चरित्र के बारे में कुछ ‘नहीं’ बताता। पिंक ठोक-बजाकर यह कहती है।
कुछ रसूखदार रईसजादों से एक कंसर्ट में मिली तीन लड़कियां हंसी-मजाक कर लेती हैं। शराब तथा डिनर का प्रस्ताव दोस्ताना मानकर स्वीकार लेती हैं। तब वे मान बैठते हैं कि लड़कियों ने उन्हें ‘ऑल रूट पास’ दे दिया है। इस गफलत में हादसा होता है जब विरोध करती हुई लड़की एक रईसजादे के सिर पर कांच की बोतल दे मारती है और पुलिस केस बन जाता है। बात अदालत तक पहुंचती है। जैसे-जैसे बहस त्रिया चरित्र को केंद्र में लाती है, वैसे-वैसे मर्दवादी सोच का पोस्टमार्टम होने लगता है।
निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी की पिंक यह ज्वलंत मुद्दा उठाती है कि देश-समाज में जब स्त्री-पुरुष भूमिकाएं तेज रफ्तार से बदल रही हैं तो मानसिकता में जड़ता क्यों? खास तौर पर यह सवाल पुरुषों से है। क्या इस लोकतांत्रिक देश में स्त्रियों को सचमुच पुरुषों के बराबर अधिकार हैं या वह पुरुषों से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रही हैं? जिसमें संघर्ष अब कुछ तेज हो गया है। पिंक में घटनाओं से ज्यादा विचार पर जोर है। इसीलिए हादसा फिल्म के अंत में तकरीबन चौथाई स्क्रीन में सिमट जाता है, जब कास्ट एंड क्रू के नाम चमकते हैं।
अगर फिल्म में वैचारिक उत्तेजना न हो या आप उससे खुद को कनेक्ट न कर सकें तो पिंक बोर करेगी। खास तौर पहला हिस्सा। निर्देशक ने इसे ऐसे अंदाज में बनाया मानो कपड़े निचोड़ कर गैलरी में सूखने के लिए तार पर डाले और भूल गए! बातें-बहसें दूसरे हिस्से में हैं, जब एडवोकेट दीपक सैगल (अमिताभ बच्चन) अदालत में लड़कियों के पक्ष में खड़े होते हैं। उनके तर्कों में कुछ बातें पुरानी हैं और कुछ नईं। कोर्ट के बाहर वह ज्यादातर मास्क लगाए रहते हैं ताकि प्रदूषण से बचे रहें। क्या यह प्रतीकात्मक है?
दूसरे हिस्से का लंबा अर्सा अदालत में गुजरता है। प्रताड़ित लड़कयों के रोल में तापसी पन्नू, कृति कुल्हाड़ी, आंद्रिया तरैंग ने अपनी भूमिकाओं से न्याय किया मगर अंगद बेदी के हिस्से कुछ खास नहीं आया। पियूष मिश्रा प्रभावित करते हैं। शुरुआत से कठोर यथार्थ को दिखाते हुए फिल्म धीरे-धीरे लचीले सिनेमाई काव्यात्मक न्याय की तरफ मुड़ जाती है। नतीजा, अंततः नैतिक पाठ की तरह साबित होती है। तय है कि समाज के साथ-साथ हमारे सिनेमा को अभी और सबक सीखने हैं।