आपको 'अपनी सी' लगेगी मालगुड़ी डेज की कहानी
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मालगुड़ी का संसार रचने वाले अंग्रेजी लेखक आरके नारायण को गूगल ने डूडल के जरिए श्रद्धांजलि दी है। यह वही नारायण हैं जिन्होंने एक काल्पनिक औपन्यासिक गांव ही बसा दिया था। इस पर मालगुड़ी डेज के नाम से एक टीवी सीरियल भी बना जो आज भी बेहद पॉपुलर है।
यह मालगुड़ी है क्या? कभी आरके नारायण ने एक इंटरव्यू में कहा था- लोग अक्सर पूछते हैं:‘लेकिन यह मालगुडी है कहाँ?’जवाब में मैं यही कहता हूँ कि यह काल्पनिक नाम है और दुनिया के किसी भी नक्शे में इसे ढूंढा नहीं जा सकता।
हालांकि नारायण यह भी बताते हैं कि शिकागो विश्विद्यालय ने एक साहित्यिक एटलस प्रकाशित किया है जिसमें भारत का नक्शा बनाकर उसमें मालगुडी को भी दिखा दिया गया है। अगर मैं कहूँ कि मालगुडी दक्षिण भारत में एक कस्बा है तो यह भी अधूरी सच्चाई होगी, क्योंकि मालगुडी के लक्षण दुनिया में हर जगह मिल जायेंगे।
जानिए आर के नारायण के बारे में
बहरहाल मालगुडी को अस्तित्व में आए भले ही 75 साल से ज्यादा हो गए मगर उनका उपन्यास ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’और वह काल्पनिक गांव मालगुडी करोड़ों पाठकों की मन आज भी वैसा का वैसा बसा हुआ है। इसी उपन्यास ने भारतीय अंग्रेजी लेखन के सामर्थ्य को विश्वस्तर पर साबित किया।
नारायण का पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी एय्यर नारायण स्वामी था। आज वह वह अंग्रेजी साहित्य के महान उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। जाने-माने लेखक ग्राहम ग्रीन मालगुडी के बच्चों स्वामी, राजम, मणि के कारनामे इतने पसंद आए कि उन्होंने आरके नारायण को अपना प्रिय लेखक बताया।
नारायण के उपन्यास ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ को यूरोप में छपवाने के लिए ग्राहम ग्रीन ने निजी तौर पर मदद की। बहुत से प्रकाशकों ने इसको छापने से मना कर दिया था। इसकी पांडुलिपि किसी तरह से ग्राहम ग्रीन तक पहुंची तो वे चमत्कृत रह गए।
बताते हैं कि ग्राहम ग्रीन की सलाह पर ही आर. के. नारायणस्वामी के नाम से लिखने वाले लेखक ने अपना नाम बदलकर आर. के. नारायण किया था।
दूरदर्शन पर लोकप्रिय हुआ धारावाहिक
मालगुड़ी डेज को भारत में असली लोकप्रियता तब मिली जब अस्सी के दशक में दूरदर्शन ने कई स्वतंत्र निर्माता-निर्देशकों को टेलीविज़न धारावाहिक बनाने का न्योता दिया। आरके नारायण की कृति पर आधारित मालगुडी डेज़ इन्हीं में से एक ऐसा धारावाहिक था जो बच्चों और बड़ों के बीच समान रूप से बेहद लोकप्रिय हुआ।
पद्मराग फिल्म्स के टी.एस.नरसिम्हन द्वारा 1987 में निर्मित मालगुडी डेज़ का निर्देशन दिवंगत कन्नड़ अभिनेता व निर्देशक शंकर नाग ने किया था। इस धारावाहिक का फिल्मांकन कर्नाटक के शिमोगा जिले स्थित अगुम्बे में किया गया।
धारावाहिक के संगीत निर्देशक थे जाने माने वायलिन वादक एल.वैद्यनाथन। धारावाहिक में दिखाये चित्रों को लेखक के भाई और टाईम्स आफ इंडिया के जानेमाने कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण ने तैयार किया था। दूरदर्शन पर मालगुडी डेज़ के कुल 39 एपिसोड प्रसारित हुये। यह धारावाहिक मालगुडी डेज़ रिटर्न नाम से पुनर्प्रसारित भी हुआ।
दिल को छूती थी कहानियां
इस टीवी सीरियल में स्वामी एंड फ्रेंड्स तथा वेंडर आफ स्वीट्स जैसी लघु कथाएँ व उपन्यास शामिल थे। इस धारावाहिक को हिन्दी व अंग्रेज़ी में बनाया गया था। इसमें कुछ लंबी कहानियों को भी प्रस्तुत किया गया था।
'वेंडर आफ स्वीट्स' एक मिठाई विक्रेता जगन की कहानी थी जिसमें विदेश से लौटे अपने बेटे के साथ उसके पटरी बिठाने के प्रयास का वर्णन था। जगन कीभूमिका में थे, शंकर के भाई और कन्नड़ और हिन्दी फिल्मों के जाने माने अभिनेता अनंत नाग। सबसे ज्यादा लोकप्रियता मिली 'स्वामी एंड फ्रेंड्स' को।
जहां दस बरस के स्वामीनाथन, जिसे उसके दोस्त स्वामी पुकारते हैं, के इर्दगिर्द घूमती है। स्वामी के किरदार को स्कूल जाना ज़रा भी पसंद न था, पसंद था तो अपने दोस्तों के साथ मालगुडी में मारे मारे फिरना।
स्वामी के पिता, जिनका किरदार गिरीश कर्नाड ने निभाया था, सरकारी नौकर थे। स्वामी के दो करीबी दोस्त थे, मणि और चीफ पुलिस सुपरीटेंडेंट के पुत्र राजम। स्वामी के किरदार में मंजुनाथ तो जैसे घर घर में लोकप्रिय हो गये थे।
हमारे आस-पास के ही थे किरदार
मालगुड़ी डेज की खूबी थी कि उसके किरदार हमारे आसपास के ही लगते थे। दरअसल इसके पीछे नारायण की मानव मन की गहरी समझ और अपने आसपास के वातावरण और चरित्रों की पहचान भी काम करती थी।
उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था- भारत में कहानी-लेखक के लिए विषयों की कमी नहीं होती। हमारी संस्कृति इतनी विस्तृत है कि उसमें विषयों की भरमार है : हर आदमी दूसरे आदमी से न सिर्फ आर्थिक स्थिति में, बल्कि दृष्टिकोण, आदतों और यहाँ तक कि रोजमर्रा के जीवन-दर्शन में भी एक-दूसरे से अलग है।
ऐसे समाज में जीना और रहना, जो मशीन की तरह एक जैसी जिन्दगी नहीं जीता, जिसमें एक रसता नहीं है, बहुत मनोरंजक और उत्तेजक होता है। ऐसी स्थिति में कहानी लेखक के खिड़की से बाहर गर्दन निकालकर झाँकते ही उसे ऐसा कोई चरित्र मिल जायेगा जिस पर वह अच्छी कहानी लिख डालेगा।