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‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में उत्तराखंड फेल’
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 24 Jul 2016 12:12 PM IST
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सुरेंद्र सिंह नेगी
- फोटो : अमर उजाला
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बीते चार वर्ष में उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं होने पर सरकार सदन से सड़क तक घिरी रही।
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विपक्ष ही नहीं सत्ता पक्ष ने बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं पर स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी पर निशाना साधा। सीएम तक यह मान चुके हैं कि सरकार सिर्फ हेल्थ सेक्टर में पिछड़ी है। हेल्थ की जिन फ्लैगशिप योजनाओं की लोकप्रियता के सहारे सीएम विधानसभा चुनाव में जाने की तैयारी में थे उन्हें ही पलीता लगा दिया गया।
पिछली सरकार से विरासत में मिली स्वास्थ्य योजनाएं तक पटरी से उतर गई। चिकित्सकों के तबादलों में स्वास्थ्य मंत्री पर सीधे दखल के आरोप लगे। स्थानांतरण नीति को ठेंगा दिखाने भर से बात नहीं बनी तो जिलों में चहेतों को सीएमओ बनाने के लिए सेवानियमावली तक दरकिनार कर दी गई।
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इसी का नतीजा है कि राज्य गठन के बाद स्वास्थ्य विभाग में सबसे अधिक घपले-घोटाले सामने आए। प्रदेश की स्वास्थ्य महकमे की सेहत नासाज है पर स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी इससे इत्तिफाक नहीं रखते। अपनी कार्यशैली को जिम्मेदार मानने की जगह वह चिकित्सकों की कमी को दोषी बताते हैं।
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घपले -घोटालों का ठिकरा पिछली सरकार पर डाल खुद को पाक साफ साबित कर रहे हैं। प्रदेश की बिगड़ती स्वास्थ्य सुविधाओं के आरोपों से घिरे स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने अमर उजाला संवाददाता अनिल चंदोला के तीखे सवालों के जवाब में अपना पक्ष रखा। आप भी पढ़िए...
सवाल - पिछली सरकार में स्वास्थ्य में निजी सहभागिता (पीपीपी) की योजनाएं उपलब्धि थी, जबकि आपकी सबसे बड़ी नाकामी?
मंत्री - सही बात है। जिस कॉन्सेप्ट के साथ हमने पीपीपी को अपनाया, उस पर हम खरे नहीं उतर सके। हमारा फोकस अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर करने पर था, लेकिन सीमित संसाधन और समय पर बजट उपलब्ध ना होने के चलते यह दिक्कत हुई। केंद्र सरकार ने समय पर बजट नहीं दिया। दिल्ली, कलकत्ता या मुंबई से डॉक्टर आए लेकिन तीन-तीन माह तक वेतन नहीं मिला तो उन्होंने खुद ही हटने का फैसला किया।
सवाल - निजी सहभागिता में गड़बड़ियां पकड़ी गईं लेकिन कार्रवाई की जगह आपका समर्थन उन्हें मिला। ऐसा क्यों ?
मंत्री - जब से केंद्र में भाजपा सरकार बनी तबसे फंडिंग में दिक्कतें हुई है। सरकार को काम डॉक्टरों के माध्यम से कराना है। टाइम से पेमेंट नहीं होगा तो दिक्कत होगी। पेमेंट की जिम्मेदारी सीएमएस-सीएमओ की है। यहां से बिल डीजी ऑफिस और सचिव तक जाते हैं। उसमें दो से तीन माह का समय लग जाता है। मैंने कहा कि सीएमओ की जिम्मेदारी है तो उन्हें अधिकृत कर दिया जाए। मैंने यह भी सुझाव दिया कि कम से कम सेलरी का भुगतान तो समय से कर दिया जाए। हम इसे समझ नहीं पाए। जो कुछ भी हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण था।
सवाल - खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत मान रहे हैं कि सरकार सिर्फ स्वास्थ्य के मोर्चे पर विफल रही?
मंत्री - ऐसा नहीं है, स्वास्थ्य विभाग में बहुत काम हुए। बस दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों के अस्पतालों तक हम डॉक्टर भेजने में कामयाब नहीं हुए। हमने पहाड़ पर डॉक्टर भेजने के लिए 20 फीसदी अतिरिक्त वेतन देने की प्रोत्साहन योजना शुरू की। डॉक्टरों के परिवार के दून, ऊधमसिंह नगर, नैनीताल और हरिद्वार में रुकने पर रेंटल कॉस्ट देने को मंजूरी दी। इसके अलावा भी चिकित्सकों के लिए कई योजनाएं चलाई गई ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो सके। अपने कार्यकाल में मैंने करीब 550 डॉक्टरों की नियुक्ति की। वहीं 200 बीडीएस की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 583 बीएएमएस डॉक्टरों की भी नियुक्ति हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए लगभग 850 करोड़ की योजना बनाई, जिसको केंद्र के स्तर से मंजूरी अपेक्षित है। जच्चा-बच्चा की सुविधा के लिए खुशियों की सवारी लांच की गई।
सवाल - एक तरफ आप डॉक्टरों की कमी का रोना रोते हैं और तमाम पसंदीदा डॉक्टरों को पहाड़ से उतार कर मैदान में डाक्टर अटैच कर दिया?
मंत्री - मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना और हेल्थ डेवलपमेंट सिस्टम समेत अन्य योजनाओं को चलाने के लिए कुछ डॉक्टर मुख्यालय में अटैच किए गए हैं। उसके अलावा कोई भी डॉक्टर अटैच नहीं है।
सवाल - कैबिनेट ने तो अटैचमेंट खत्म करने का फैसला लिया था फिर ?
मंत्री - अटैचमेंट खत्म करने का आदेश जारी किया गया है। डॉक्टर, फार्मासिस्ट, नर्स समेत सभी अटैच कर्मियों को एकतरफा रिलीव कर दिया गया है। उन्हें वेतन तभी मिलेगा, जब वह मूल तैनाती स्थल पर ज्वाइनिंग देंगे।
सवाल- आपके कार्यकाल में स्वास्थ्य विभाग में सबसे ज्यादा घपले-घोटाले हुए। आपकी चुप्पी सवालों के घेरे में है?
मंत्री - भाजपा सरकार के दौरान 2008-09 में दवा घोटाला हुआ। इसी सरकार के समय तेल बिल घोटाला हुआ, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय की संलिप्तता भी पाई गई। यह दोनों मामले मैंने उजागर किए। दोषियों ने कोर्ट की शरण ली है और मामला विचाराधीन है। जांच के बाद ही अन्य मामलों में कुछ कहा जा सकेगा।
सवाल - आरोप है कि आप भ्रष्ट और दागी अधिकारियों को संरक्षण दे रहे हैं ?
मंत्री - जिन जिलों में तेल बिल घोटाला बड़े स्तर पर हुआ उन्हें हटा दिया गया। टिहरी के सीएमओ डा. एसपी अग्रवाल को दून लाया गया। जैसे ही उनके घोटाले में शामिल होने की जानकारी मिली, उन्हें हमने मंडल बदर कर दिया। मैंने किसी अधिकारी को प्रश्रय नहीं दिया।
सवाल - राज्यपाल एडी को सीएमओ बनाने के निर्देश देते हैं, आप शासन की सूची बदल कर जेडी को पदों पर बैठा रहे हैं?
मंत्री - राष्ट्रपति शासन के दौरान एडी को दून और हरिद्वार में सीएमओ बनाने का प्रस्ताव आया। दोनों एडी ने कहा कि वह सीएमओ पद पर काम नहीं करना चाहते। जब वह इंट्रेस्टेस्ड नहीं थे तो किसी ना किसी को तो भेजना था। हमने महानिदेशालय के एडी से भी पूछा लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
सवाल - सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट एमएसबीवाई ठप पड़ा है। मुफ्त जांच व दवा वितरण लटका है। क्या इसकी जिम्मेदारी आपकी नहीं है?
मंत्री - हमारे पास संसाधन सीमित हैं। एमएसबीवाई, मुफ्त जांच व दवा वितरण पर हमने पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन राष्ट्रपति शासन लगने से योजना शुरू करने में देरी हुई है। अगस्त से पौने दो लाख रुपये तक के बीमा कवर के साथ संशोधित योजना हर हाल में शुरू कर दी जाएगी। अब कुछ नए निजी अस्पतालों को भी इंपैनल करने के निर्देश दिए हैं। एनएचएम की पीआईपी में मुफ्त जांच को शामिल किया गया है। केंद्र से बजट मिलते ही यह योजना शुरू कर दी जाएगी।
सवाल - आपको केवल कोटद्वार का स्वास्थ्य मंत्री कहा जाता है?
मंत्री - जितना भ्रमण जिलों का मैंने किया वह रिकॉर्ड है। मैंने अधिकांश अस्पतालों का दौरा किया। डॉक्टरों को छोड़कर अन्य कमियां भी दूर की है। अक्सर संडे को हम चले जाते हैं। हमने उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी, पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा, ऊधमसिंह नगर, नैनीताल का भ्रमण किया है। ब्लॉक स्तर पर भी गया हूं। स्वाभाविक रूप से लोगों की इच्छा होगी कि मुझे और घूमना चाहिए था।
सवाल - चर्चा है कि कोटद्वार में भी जनता आपसे खुश नहीं है, आप यमकेश्वर विधानसभा से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं?
मंत्री- इसमें सच्चाई नहीं है। कोटद्वार मेरा घर है, वहां से कहीं नहीं जाऊंगा। यमकेश्वर के लोग आज भी चाहते हैं कि मैं वहां से लड़ूं। जनता की मांग की वजह से शायद यह बात उठती है। वह मेरा सबसे प्रिय क्षेत्र रहा है। वहां से मुझे बहुत प्यार और सम्मान मिला है। मैं कोटद्वार में काम कर रहा हूं। दूसरा मैं यमकेश्वर में किसी का हक नहीं मारना चाहता। वहां से भी कोई तैयारी कर रहा होगा। परिस्थितियां क्या होगी, उस पर कुछ नहीं कहा जा सका। पार्टी टिकट देगी तो लड़ूंगा नहीं तो आराम।