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आतंकवाद को अमेरिकी जवाब

Sun, 16 Apr 2017 09:18 AM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Sun, 16 Apr 2017 09:18 AM IST
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US response to terrorism
कुलदीप तलवार

अमेरिका ने अफगानिस्तान मे आईएस के ठिकानों पर भीषण बमबारी कर यह एहसास कराया है कि वह आईएस के आतंकी हमलों पर चुप बैठा नहीं रह सकता। अमेरिका ने आईएस के ठिकानों पर जो बम बरसाया, उसका असर इतना भयानक था कि लगभग दो किलोमीटर तक उसकी धमक सुनी और महसूस की गई। अमेरिका द्वारा गिराए गए इस बम को सभी बमों की मां कहा जा रहा है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही आईएस के आतंकवादियों को खत्म करने का वायदा कर चुके हैं, क्योंकि आईएस  के बढ़ते कदमों से मध्य एशिया समेत दक्षिण एशिया की शांति प्रभावित हो रही है।

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ट्रंप ने ओबामा प्रशासन की पिछली कुछ नीतियों में बदलाव करना भी शुरू कर दिया है। मसलन, उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को एक बार फिर आतंकवादी समूहों के खिलाफ ड्रोन हमले करने का अधिकार दे दिया है। इससे पहले यह अधिकार अमेरिका के रक्षा विभाग के पास था और सीआईए केवल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल करती थी। पर अब सीआईए पेंटागन या ह्वाइट हाउस की अनुमति लिए बगैर भी ड्रोन हमले कर सकेगा। इससे अब ड्रोन हमलों में तेजी आएगी। काबिल-ए-गौर है कि ओबामा प्रशासन के अंतिम आठ महीनों मे ड्रोन हमले बंद थे। माना जा रहा है कि ट्रंप ओबामा की कुछ और नीतियों में भी बदलाव करने जा रहे हैं। इससे मध्य एशिया और अफगानिस्तान समेत भारत भी प्रभावित होगा। मसलन, उम्मीद की जा रही है कि अफगानिस्तान को दी जा रही अमेरिकी आर्थिक मदद बढ़ा दी जाएगी। अफगान सेना की बढ़ी हुई जरूरतों के लिए भारी मात्रा में हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति भी की जाएगी। अफगान वायुसेना को भी मजबूत किया जाएगा। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की इस बारे में ट्रंप से फोन पर बात हो चुकी है। इस बातचीत में आर्थिक विकास और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने पर जोर दिया गया है। ट्रंप तालिबान से बात करने के हक में भी नजर नहीं आ रहे, क्योंकि ओबामा के समय तालिबान को शांति प्रक्रिया की मेज पर लाने में कम से कम एक दशक तक इंतजार करना पड़ा और समय की बर्बादी हुई।
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गौरतलब है कि अफगानिस्तान इन दिनों फिर आतंकवाद के भयानक दौर से गुजर रहा है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब निर्दोष नागरिकों को जान से हाथ न धोना पड़ता हो। असुरक्षा के इस माहौल ने जन-जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के एक हजार से ज्यादा स्कूल बंद हैं। ये तमाम स्कूल तालिबान विद्रोहियों के निशाने पर हैं। कुछ  स्कूलों पर बम गिराए गए हैं, तो कुछ स्कूल जबरन बंद कराए गए हैं। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ समय में अफगानिस्तान में लगभग 700 लोग मारे गए और 1,177 लोग घायल हुए हैं। सच यह है कि अफगान सरकार और अफगान सुरक्षा बल आतंकवादी गुटों पर काबू पाने में विफल रहे हैं। इसका मुख्य कारण अमेरिका द्वारा अपने अधिकांश सैनिकों को वापस बुला लेना तो है ही, अमेरिका ने अफगान वायुसेना को मजबूती प्रदान करने से इन्कार कर भी अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराया है। इससे तालिबान विद्रोहियों को फायदा मिल रहा है। तालिबान ने आईएस से हाथ मिला लिया है, जिसका का मकसद अफगानिस्तान की सत्ता पर फिर से कब्जा करना है। वहीं आईएस का लक्ष्य दुनिया में इस्लामी राज्य कायम करना है। आईएस की यह खतरनाक सोच अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों में भी पैठ बना रही है। इसका बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत पर असर पड़ रहा है।
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राजधानी काबुल में हाल ही में अमेरिकी दूतावास के पास स्थित सबसे बड़े सैन्य अस्पताल पर डॉक्टरों की पोशाक में आतंकवादियों के धावा बोलने से 30 से अधिक लोग मारे गए और दर्जनों लोग घायल हुए थे। इस हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली थी। इससे कुछ ही दिन पहले काबुल स्थित सर्वोच्च न्यायालय पर हमला कर, जिसमें 19 लोग मारे गए थे, आईएस ने बता दिया था कि उनके लिए राजधानी की अभेद्य सुरक्षा को भेदना मुश्किल नहीं है। इससे पहले संसदीय सचिवालयों के कर्मचारियों पर भी हमला हो चुका है, जिसमें 30 लोग मारे गए थे और 80 लोग घायल हुए थे। लगातार होते आतंकवादी हमलों के खिलाफ अफगान नागरिकों के स्वर तेज हुए हैं, तो इसकी वजह यही है। न केवल लोग आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि  कई जगहों पर उन महिलाओं ने हथियार उठा लिए हैं, जिनके पति, बेटे और भाई आतंकी हमलों में मारे गए हैं। दूसरी तरफ आईएस की देश में मौजूदगी बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की 19वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा के अशांत इलाके में लड़ाकुओं की लगातार भर्ती हो रही है। इस समय अफगानिस्तान में आईएस के 2,000 से 3,500 आतंकी मौजूद हैं। सीरिया में आईएस के लगभग खात्मे के बाद बेरोजगार हुए आईएस से जुड़े युवा अफगानिस्तान में घुस रहे हैं।

आईएस एक ऐसा आतंकी संगठन है, जो सीरिया, इराक, लीबिया, तुर्की और यूरोप के कई शहरों में निहत्थों के खून बहा चुका है। अब वह बांग्लादेश में भी घुसपैठ करने में सफल हो गया है। चंद दिन पहले ही बांग्लादेश के चटगांव शहर में पुलिस के छापे में आईएस के पांच आतंकी मारे गए। वहां की एक सैन्य शिविर पर आईएस द्वारा किए गए हमले में भी कई सैनिक घायल हुए। इससे पहले आईएस के आतंकियों ने पाकिस्तान के सिंध में लाल शहबाज कलंदर की दरगाह पर हमला कर अनेक लोगों की जान ली थी, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। आईएस ने भारत में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा ली है। एक लंबी मुठभेड़ में आईएस से रिश्ता रखने वाले सैफुल्लाह नामक युवक का मारा जाना और उसके साथियों का पकड़ा जाना इसकी मिसाल है। जबकि हमारी सरकार यह कह रही है कि आईएस भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों में सफल नहीं हो सकेगा।


लेकिन अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई को देखते हुए उम्मीद करनी चाहिए कि ट्रंप हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान को बीच में नहीं छोड़ेंगे और आईएस समेत दूसरे आतंकी संगठनों को ध्वस्त करके ही चैन लेंगे।

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