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जीएम सरसों का सच

Tue, 01 Nov 2016 06:16 PM IST
देविंदर शर्मा
देविंदर शर्मा Updated Tue, 01 Nov 2016 06:16 PM IST
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Truth of GM mustard
देविंदर शर्मा

कुछ ही हफ्ते पहले जब जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्राइजल कमिटी (जीईएसी), जिसकी सहमति जेनिटिकली मोडिफाइड फसल के लिए अनिवार्य है, से अनुसंधानकर्ताओं, किसान प्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संगठनों और कुछ अन्य लोगों के समूह ने पूछा कि क्या जीएम सरसों के कारण कीटनाशकों का उपयोग कई गुना बढ़ जाएगा, तो उन्होंने इससे इन्कार कर दिया। जब उनसे फिर पूछा गया कि क्या वे जानते हैं कि हमारे देश में सरसों की ऐसी किस्में मौजूद हैं, जिनकी उपज जीएम सरसों से ज्यादा है, तो उन्होंने अनभिज्ञता जताई। अगर जीईएसी में इस हद तक अज्ञानता है, तो समझा जा सकता है कि उससे क्या अपेक्षा की जा सकती है, जो इस उद्योग के लिए बस एक रबर स्टांप की तरह कार्य करती है।

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जीएम सरसों की डीएमएच-11 किस्म जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने तैयार किया है और जिसका नेतृत्व विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक पेंटल कर रहे थे, उसे लेकर इन दिनों हंगामा मचा हुआ है। हाल ही में बीस राज्यों के 120 नागरिक समूहों ने इसके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन किया। जबकि सरकार देश में जीएम फसलों की शुरुआत करने के लिए ज्यादा उत्सुक है। सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि जीएम किस्म से उपज में तीस फीसदी का इजाफा होगा, जिससे खाद्य तेलों का आयात घटेगा, जो अभी हर साल 66 हजार करोड़ रुपये का होता है। कुछ वरिष्ठ पत्रकार भी जीएम फूड्स की शुरुआत की लॉबिंग के लिए इसी दोषपूर्ण तर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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उच्च पैदावार का दावा ऐसे समय किया जा रहा है, जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी कृषि विभाग के आंकड़े का इस्तेमाल करके अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि दुनिया में कहीं भी जीएम फसलों से प्रत्यक्ष पैदावार में कोई लाभ नहीं दिखा है। इससे केवल यही साबित होता है कि भारत में जीएम फसलों को लेकर जो दावा किया जा रहा है, वह झूठा है। दिल्ली विश्वविद्यालय का एक अन्य अध्ययन बताता है कि देश में ऐसी पांच गैर जीएम सरसों की किस्में हैं, जो पैदावार में जीएम किस्मों को मात देती हैं। इनमें से दो किस्में जीएमएच-3 और जीएमएच-4 की खेती लगभग नौ साल से की जा रही है और उसकी पैदावार भी काफी है।
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असल में दीपक पेंटल ने बड़ी ही चतुराई से कुछ कमजोर किस्मों से तुलना करके आंकड़े को छिपा दिया। सबसे बुरी बात तो यह है कि जीईएसी ने अज्ञात कारणों से ऑल इंडिया क्रॉप रिसर्च ट्राइल के पैदावार से संबंधित आंकड़ों को नहीं देखा, जहां जीएम सरसों उत्पादन में बढ़त दिखाने में विफल रही। मुझे नहीं मालूम कि किस तरह से जीएम सरसों की इस किस्म के जरिये देश के खाद्य तेल आयात का बिल कम होगा, जिसकी पैदावार मौजूदा खेती की जा रही किस्मों से भी कम है। जीएम सरसों की यह किस्म वास्तव में कूड़ा है, जिसे डस्टबिन में डालना चाहिए।

अब जरा खाद्य तेल के आयात बिल पर नजर डालिए। वर्ष 2015 में भारत ने 66 हजार करोड़ रुपये के खाद्य तेल का आयात किया, जो कुल खाद्य तेल जरूरत का लगभग 60 फीसदी है। खाद्य तेल का इतना ज्यादा आयात इसलिए नहीं हुआ कि तिलहन की फसल कमजोर हुई। जो बात लोगों की निगाह से छिपाई गई, वह यह कि 1993-94 में खाद्य तेल के मामले में भारत आत्मनिर्भर था, जो अपनी जरूरत का करीब 97 फीसदी तिलहन का उत्पादन देश में ही करता था। यह तब हुआ, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए खाद्य तेल तकनीकी मिशन की शुरुआत की। इस मिशन की शुरुआत 1986 में की गई थी और दस वर्षों के भीतर ही भारत खाद्य तेल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो गया।

उसके बाद ही देश ने आयात शुल्क घटाना, सस्ते आयात को अनुमति देना और आयात बढ़ाना शुरू किया। 300 फीसदी आयात शुल्क की स्वीकार्य सीमा से धीरे-धीरे इसे घटाकर शून्य पर लाने में भारत सक्षम हुआ। यहां तक कृषि मंत्रालय और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने कई बार इसे गलत व्यापार नीति बताकर चेताया, लेकिन इसके प्रभाव की तरफ इशारा नहीं किया। तब खाद्य तेल के उत्पादन में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ी थी।

भारत में खाद्य तेल क्रांति, जिसे पीली क्रांति कहा जाता है, को हमारी अपनी दोषपूर्ण व्यापार नीतियों के जरिये व्यवस्थित रूप से खत्म कर दिया गया। यदि अब देश को आयात कम करना है, तो यह तभी संभव है, जब आयात शुल्क को ज्यादा नहीं, तो कम से कम सौ फीसदी तक बढ़ाया जाए। तभी ऐसा अनुकूल माहौल बन सकता है, जिसमें किसान तिलहन की खेती की ओर मुड़ें।

यदि जीएम सरसों उत्पादकता बढ़ाने में विफल रही और गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ, तो भला क्यों जीईएसी की एक उप-समिति को इसकी खेती के लिए मंजूरी देनी चाहिए? इस किस्म से न तो किसानों का भला होगा और न ही उपभोक्ताओं का। जीएम सरसों की खेती से सिर्फ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर को फायदा होगा। जीएम सरसों में जो तीन जीन डाले गए हैं, उससे बायर के ब्रांड वाले बास्ता कीटनाशक का उपयोग बढ़ेगा। जीएम सरसों में एक ऐसा जीन है, जो किसानों को खर-पतवार नियंत्रण के लिए सिर्फ बास्ता कीटनाशक के उपयोग की अनुमति देता है। यदि किसान किसी दूसरे कीटनाशक का इस्तेमाल करेंगे, तो फसल जल जाएगी।


हैरानी नहीं कि न्यूयॉर्क टाइम्स के अध्ययन (जिसका जिक्र ऊपर हुआ है) ने यह खुलासा किया कि जीएम फसलों की शुरुआत के बाद से कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा है। भारत में भी बीटी कॉटन की खेती शुरू होने के बाद रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा। यदि जीएम सरसों को मंजूरी मिल जाती है, तो आप सरसों के साग में जहर खाने के लिए तैयार हो जाइए।

- लेखक कृषि व्यापार नीति विशेषज्ञ हैं

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