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फौज के नियंत्रण में है पाकिस्तान

Thu, 21 Sep 2017 08:09 AM IST
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़ Updated Thu, 21 Sep 2017 08:09 AM IST
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Pakistan is under the control of the army
पाकिस्तानी फौज

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि जब भी चुनी हुई सरकारों ने मुल्क को गड्ढे में छोड़ दिया, उसे उससे बाहर निकालने के लिए सेना सत्ता में आई। अपने अधिकांश सैन्य साथियों की तरह उन्हें भी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार से बैर है, इसके पीछे सत्ता है, जिसके जरिये वे देश को नियंत्रित करते हैं। हालांकि दूसरी तानाशाहियों की तरह, जब भी पाकिस्तान में सेना ने सत्ता पर कब्जा किया, उसने राष्ट्रीय ताने-बाने को तोड़ने का काम किया है।

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जिन देशों में तानाशाहियां रही हैं, वहां उसने राष्ट्र को समय से पीछे धकेला है और मजबूर लोकतांत्रिक नेताओं को उसे वापस पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। पाकिस्तान इसका अपवाद नहीं है। यहां तक कि जिन देशों में सेना पर्दे के पीछे से शासन करती है, उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय अलगाव और आलोचना का सामना करना पड़ा है। निर्वाचित राजनीतिक प्रतिनिधि फिर भी दिमाग लगाते रहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में राष्ट्र को कैसे फिर से शामिल किया जाए।
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पाकिस्तान में कई तानाशाह शासक हुए हैं, जिन्होंने राष्ट्र को लगभग अलग-थलग करके छोड़ दिया। सैन्य तानाशाह याह्या खान के कार्यकाल में पाकिस्तान का बंटवारा हुआ और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। जिया ने इस्लामी कानून लागू करके सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता के द्वार खोले, जिसने पाकिस्तान के पूरे भविष्य को कुचल डाला। मुशर्रफ के कट्टरपंथ के कारण मुल्क के विभिन्न हिस्सों में अलगाववादी कार्रवाई में तेजी आई, अर्थव्यवस्था पतन के कगार पर आ गई, और वह स्वयं भागकर निर्वासन पर चले गए, ताकि हत्या समेत विभिन्न आरोपों के मामले में मुकदमों से बच सकें।
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सेना का मुल्क पर नियंत्रण कुछ ऐसा है कि अगर कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि उनकी निर्धारित विचारधारा को बदलने या उनके नियंत्रण को सीमित करने की कोशिश करता है, तो उनके दिन गिने-चुने रह जाते हैं। नवाज शरीफ को इस स्थिति का कई बार सामना करना पड़ा है। वैश्विक निंदा के बावजूद आतंकी समूहों को पाक की सेना का समर्थन निरंतर मिलता रहा है। वे आतंकी समूहों का खुलेआम समर्थन करते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि किसी भी निर्वाचित सरकार में उन्हें सुधारने या सलाह देने की ताकत नहीं है।

कुख्यात 'डॉन लीक' को स्पष्ट रूप से राजनीतिक कारणों से अंजाम दिया गया, यह जानते हुए कि पाकिस्तान के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इसने सेना को इस हद तक नाराज किया कि सेना के जनसंपर्क विभाग के प्रमुख ने लगातार कई ट्वीट करके तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कैबिनेट बैठक बुलाने के लिए मजबूर कर दिया, नतीजतन सूचना मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इस मुद्दे को हल करने के लिए सेना और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच कई बार बातचीत हुई।

पाकिस्तान को एक बार फिर से अंतराष्ट्रीय आलोचना की तरफ धकेला जा रहा है, जब शियामेन में चीन की अध्यक्षता में ब्रिक्स सम्मेलन में रूस के समर्थन से पाकिस्तानी आतंकी समूहों का घोषणापत्र में जिक्र किया गया। पाकिस्तान के सहयोगी देश भी वैश्विक समुदाय के साथ शामिल होकर पाकिस्तानी आतंकी समूहों का नाम ले रहे हैं। सेना नियंत्रित इस मुल्क में जहां सेना खुलेआम आतंकी समूहों का समर्थन करती है, तो राजनेताओं की यह मजबूरी बन जाती है कि वे कहें कि मुल्क में ऐसा कोई समूह नहीं है। जब सभी राष्ट्र (पाकिस्तान समर्थक भी) उन आतंकी समूहों की निंदा करते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से राष्ट्र और सरकार के लिए शर्मिंदगी का विषय है।

पाकिस्तान के विदेशी मामलों के पूर्व सलाहकार सरताज अजीज ने भी बयान दिया है कि आतंकी समूहों पर पाकिस्तान का प्रभाव है, क्योंकि वह लगातार उन्हें समर्थन देता है। पाकिस्तान के मौजूदा विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने स्थिति की गंभीरता की तरफ इशारा करते हुए कहा कि भारत-विरोधी आतंकी समूहों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
 
यह कोई पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तानी सेना ने अपने मुल्क को नीचा दिखाया है। अब जाधव के मामले को ही ले लीजिए, स्पष्ट रूप से यह अपहरण का मामला है, लेकिन फर्जी सुनवाई और सजा देने, यहां तक कि अपने राजनेताओं को उससे नहीं मिलने देने जैसी कार्रवाई के जरिये सेना ने पाकिस्तान को बैकफुट पर ला दिया।
 
भारत-पाक रिश्ते अधिक सौहार्दपूर्ण होते, महत्वपूर्ण मुद्दे हल हो गए होते और दोनों राष्ट्र समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ रहे होते, अगर पाकिस्तानी सेना गहरे राजनीतिक अविश्वास को जन्म नहीं देती। जब भी वहां की निर्वाचित सरकार ने वार्ता पर विचार किया या लंबित मुद्दों का समाधान सुझाया, आतंकी हमलों के जरिये रिश्ते को खराब करने की कोशिश की गई। यही स्थिति अफगानिस्तान के साथ है। वहां भी तबाही मचाने वाले आतंकी समूहों को पाकिस्तान से समर्थन मिलता है। इसलिए अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है।

भारत ने कई मौकों पर उनकी रक्षा पंक्ति, सैन्य प्रशिक्षण शिविर और सैन्य कमानों को नष्ट करके अपनी क्षमता का सबूत दिया है। इन कारर्वाइयों ने उन्हें युद्ध विराम उल्लंघन कम करने के लिए विवश किया। इसी के चलते पाक अधिकृत कश्मीर में लोगों का विरोध बढ़ रहा है और उनकी छवि पर असर पड़ रहा है। इस संदेश को अमेरिका ने भी समझ लिया है, जो अतिरिक्त बलों को शामिल करके पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर ऐसी ही कार्रवाई करेगा।


आर्थिक रूप से पाकिस्तान पतन के कगार पर है। चीन को छोड़कर कोई भी देश सैन्य वर्चस्व वाले मुल्क में निवेश नहीं करना चाहता। परमाणु हथियार ही उसका रक्षा कवच है, जो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। अन्य तानाशाहों या सैन्य सरकारों की तरह पाकिस्तान भी आने वाले दिनों में आंतरिक आपदा की तरफ बढ़ रहा है।

-लेखक सेवानिवृत्त मेजर जनरल हैं

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