नेपाल में भारत के लिए अवसर
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अक्सर ऐसा माना जाता है कि नेपाल की भारत पर निर्भरता इतनी मौलिक है कि वहां के मृतकों को भी काशी में मोक्ष और निर्वाण मिलता है। बेशक यह पारलौकिक परंपरा भविष्य में भी जारी रहेगी, पर सांसारिक वास्तविकता तेजी से बदल रही है। अपने क्षेत्रीय और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के साथ चीन के उदय ने पूरे दक्षिण एशिया को बदल दिया है। यह प्रक्रिया बदलने वाली नहीं है और पहले से बेहतर ढंग से स्वीकार की जा रही है। हिमालय के दक्षिण में अवस्थित भारत वाकई अपने भूगोल, आबादी और संसाधनों के लिहाज से विशाल राष्ट्र है, लेकिन उसे अब एक बड़े, समृद्ध और बेहद महत्वाकांक्षी राष्ट्र से प्रतिस्पर्धा करनी होगी। चीन की महत्वाकांक्षा ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।
भारत-चीन के बीच पिछले दिनों जारी दोकलम गतिरोध (अब सुलझ गया है) की पृष्ठभूमि में नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की भारत यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, भले ही उनकी अपनी घरेलू और बाहरी समस्या कुछ भी रही हो। भारत और नेपाल के प्रधानमंत्रियों की बीच क्या बातचीत हुई, यह तो पता नहीं लग सकता, लेकिन माना जा सकता है कि द्विपक्षीय वार्ता से अलग दोनों प्रधानमंत्रियों ने दोकलम गतिरोध पर जरूर गंभीरता से बात की होगी, क्योंकि नेपाल भारत और चीन, दोनों देशों से जुड़ा हुआ है।
वर्ष 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशिया के नेताओं को आमंत्रित किया था। उन देशों में नेपाल एक हिंदू बहुल राष्ट्र है, जिसका हमेशा से भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से खास रिश्ता रहा है। आरएसएस के कई नेताओं ने 1975-77 के आपातकाल के दौरान नेपाल में शरण ली थी। मोदी भी प्रधानमंत्री बनने के बाद दो बार नेपाल की यात्रा पर गए हैं। पशुपति मंदिर में पूजा करते हुए उन्होंने जबर्दस्त सद्भावना जताई, जो काठमांडु को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त था। नेपाल में जब भूकंप आया, तो सबसे पहले मदद के लिए भारत ही आगे आया। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उस दौरान नेपाल में भारत की व्यापक मौजूदगी ने दूसरों के लिए रास्ता बंद कर दिया और नेपाल के लिए मुश्किलें पैदा कर दीं। लेकिन भारत का इरादा गलत नहीं था। फिर भी यह माना जाता है कि मोदी की यात्रा की चमक फीकी पड़ गई है। नेपाल के मुखर मध्यवर्ग का एक बड़ा तबका भारत-विरोधी भावनाओं से लैस है। चारों ओर से घिरा होना नकारात्मक मानसिकता बनाता है और उससे नेपालियों को काफी परेशानी होती है। भारतीय अधिकारियों का व्यवहार बड़े भाई जैसा होने का रिकॉर्ड है। भारत में अंग्रेजी राज के समय से भारतीय नेपाल के घरेलू मामलों में 'हस्तक्षेप' करते रहे हैं।
भारत ने 1988 और फिर 2015 में नेपाल की अघोषित नाकेबंदी की। जब नेपाल के लोगों का जीवन मुश्किल हो गया, तो उन्होंने समर्पण कर दिया, पर इसने द्विपक्षीय संबंधों पर असर डाला और दोनों देशों के रिश्ते संदेहपूर्ण हो गए। सबसे बड़ी बात है कि नई दिल्ली ने हमेशा काठमांडु को हल्के में लिया। मसलन 17 वर्षों के बाद यात्रा करने वाले मोदी पहले प्रधानमंत्री थे। अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बगैर भारत नेपालियों के साथ मिलकर काम कर सकता है, पर ऐसा हमेशा नहीं हुआ। बांग्लादेश की तरह नेपाल के साथ बेहतर रिश्ता कायम करने के लिए प्रतिबद्धता की जरूरत है। पड़ोसी देशों में मंझोले स्तर के राजनयिकों को भेजकर भारत ने अक्सर अपने दीर्घकालीन हितों के खिलाफ काम किया है।
खैर, यह संतोष की बात है कि प्रधानमंत्री के आसपास ही सारी गतिविधियां सिमटी रहने के बावजूद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनकी टीम के अनुभवी राजनयिक और अधिकारी विस्तृत वार्ता करने और आठ समझौतों पर हस्ताक्षर करने में सफल रहे। इनमें से कुछ समझौते उल्लेखनीय हैं, साथ ही उनका समय और उद्देश्य भी। मसलन, संभवतः कम प्राथमिकता वाले पशुपति क्षेत्र विकास परियोजना, जिसके पुनर्निर्माण और मरम्मत के काम में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) सहयोग करेगा। ऐसेे काम, जो आम नेपाली लोगों के जीवन और भावनाओं से जुड़े हैं, उन्हें पहले क्यों नहीं शुरू किया गया? एएसआई ने कई देशों-जैसे कंबोडिया में अंकोरवाट और अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की प्रतिमा के जीर्णोद्धार में सहयोग किया है। ऐसे कार्यों के लिए भारत को दुनिया भर में प्रतिष्ठा मिली। ऐसे में नेपाल कैसे उपेक्षित रहा? म्यांमार, श्रीलंका और अफ्रीकी देशों में चीन परियोजनाओं के मामले में आगे है और भारत का ध्यान वहां बाद में गया, यही बात नेपाल के बारे में कही जा सकती है। चीन के वहां पहुंचने के काफी समय बाद भारत वहां बुनियादी संरचनाओं को हाथ में लेने पर तैयार हुआ।
भारत ने अब जाकर फैसला किया है कि वह जयनगर-बिजलपुर-बार्दीबास और जोगबनी-बिराटनगर से जुड़ने के लिए रेल और सड़क परियोजनाएं शुरू करेगा। दोनों देशों को जोड़ने के लिए काफी समय पहले ही बस सेवा शुरू होनी चाहिए थी, पर अभी परिचालन विवरण पर काम करने के लिए संयुक्त कार्य समूह की ही स्थापना की जा रही है। इससे काफी पहले ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ बस एवं रेल संपर्क स्थापित हो चुका है। देउबा की यात्रा के दौरान भारत ने सड़क और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए दो क्रेडिट लाइन जारी की, एक 25 करोड़ डॉलर की और दूसरी दस करोड़ डॉलर की।
नेपाल के साथ यह समस्या है कि वहां की राजनीति अस्थिर है। इतने सारे प्रधानमंत्रियों और सरकारों के बावजूद वह संविधान का काम पूरी तरह से नहीं कर पाया है, खासकर भारतीय मूल के मधेसियों को संतुष्ट करने में वह विफल रहा है। यह द्विपक्षीय रिश्ते के लिए एक गंभीर मुद्दा है। अब जबकि संदिग्ध छवि वाले प्रचंड और भारत विरोधी के पी शर्मा ओली प्रधानमंत्री नहीं हैं, भारत को देउबा के साथ बेहतर रिश्ते बनाने चाहिए, जैसा कि मोदी-देउबा वार्ता के अंत में जारी संयुक्त बयान में कहा गया है।