नक्सलवाद: पचास साल और आगे?
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पचास वर्ष पहले 25 मई, 1967 को नक्सलबाड़ी में किसानों पर की गई पुलिस फायरिंग में नौ कृषक महिलाएं और दो बच्चे मारे गए थे। उन किसानों के खून से नक्सलबाड़ी का विद्रोह शुरू हुआ। उस बर्बर पुलिस फायरिंग का विरोध करते हुए उत्तर बंगाल के सीपीएम नेता चारु मजूमदार ने 1967 में पार्टी छोड़ दी। वह कानू सान्याल और जंगल सांथाल से जा मिले, जो नक्सलबाड़ी के संघर्षरत किसानों से करीब से जुड़े हुए थे। चारू मजूमदार की क्रांतिकारी रणनीति अनन्य रूप से माओ के विचारों से प्रेरित थी, जो घोषणा करता है कि बिना वर्ग शत्रुओं का नाश किए मुक्ति पाने का कोई दूसरा तरीका नहीं है। माओ की 'रेड बुक' की तर्ज पर उन्होंने आठ ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार किए। 1969 में माओवादी क्रांतिकारियों ने माओ की शिक्षा के आधार पर एक राजनीतिक संगठन मार्क्सवादी-लेनिनवादी स्थापित किया। चारू मजूमदार नए माओवादी संगठन के सचिव बने।
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शुरू में माओवाद का प्रयोग आंध्र के कम्युनिस्टों द्वारा 1946 से 51 के बीच तेलंगाना क्षेत्र में किया गया। अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में यह पहली बार था कि माओ की रणनीति का इस्तेमाल किया गया और सार्वजनिक तौर पर उस पर बहस की गई। उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने माओवाद की निंदा की। वर्ष 1958 से 61 के बीच चीन-सोवियत वैचारिक विवाद और चीन-भारत सीमा विवाद के चलते दक्षिण एवं वाम धड़े के बीच तीखा वैचारिक विवाद चलता रहा। सितंबर,1963 तक विवाद तीव्र हो गया और अंततः तेनाली सम्मेलन में कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन पूरा हो गया।
दिलचस्प तथ्य यह है कि भले ही विभाजन मूलभूत मुद्दों और कार्यक्रमों के आधार पर हुआ, लेकिन दोनों कम्युनिस्ट संगठन सीपीआई (भाकपा) और सीपीएम (माकपा) शांतिपूर्ण परिवर्तन की बात कर रहे थे, जिससे स्पष्ट है कि दोनों संसदीय समाजवाद को स्वीकार कर रहे थे। हालांकि कार्यपद्धति पर सर्वसम्मति भ्रामक थी, क्योंकि 1967 के चौथे आम चुनाव के बाद कांग्रेस को सभी राज्यों-पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल और उधर तमिलनाडु में तगड़ा झटका लगा था और माओवाद लौट आया था।
सीपीएम के सामने आंतरिक और बाह्य, दोनों तरह की चुनौतियां थीं-नक्सलबाड़ी के चरम वामपंथी समूहों से भी और चीन से भी। 1940 के दशक के तेलंगाना के प्रारंभिक माओवाद ने केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती दी, जिसे सोवियत हस्तक्षेप से दबा दिया गया था, वह 17 वर्ष बाद फिर से जाग गया। तब से कम्युनिस्टों की एकता खत्म हो गई और संसदीय संघर्ष के पैरोकारों और गैर संसदीय संघर्ष के पैरोकारों के बीच स्थायी रूप से दरार पड़ गई। चीन ने नक्सलबाड़ी में एक नए वसंत की शुरुआत के रूप में विद्रोह की प्रशंसा की।
पश्चिम बंगाल में किसानों की दयनीय पृष्ठभूमि में 1940 के दशक के अंत में काकदीप में किसानों ने फसलों में दो तिहाई हिस्से की मांग करते हुए विद्रोह किया। आजादी के बाद सरकार ने भूमि सुधार का कुछ काम शुरू किया। हालांकि भूमि सुधार का मसौदा बहुत खराब तरीके से तैयार किया गया था, जिसमें कई खामियां थीं, जिससे न तो उत्पादन बढ़ा और न ही बटाईदारों का भाग्य सुधरा। राज्य को अन्न की भारी कमी का सामना करना पड़ा। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में शरणार्थियों के प्रवाह ने भी इसमें योगदान किया, पर मुख्य कारण संरचनागत था। भूमि का अर्ध सामंती स्वामित्व, भूमि पर किसानों के स्वामित्व का अभाव तथा अस्तित्व का मुश्किल से निर्वाह कृषि क्रांति के लिए अनुकूल नहीं था या कृषि का व्यावसायीकरण संभव नहीं था।
इस ठहराव और शोषण की पृष्ठभूमि में नक्सलबाड़ी का नारा किसानों को भूमि का स्वामित्व प्रदान कर रहा था, जिसने उन्हें वितरित की गई भूमि पर कब्जा करने के लिए प्रेरित किया। नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन 600 किलोमीटर दूर गोपीबल्लभपुर तक फैल गया।
नक्सलबाड़ी का महत्व इसके भटकाव में नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल में कृषि के प्रभावी परिवर्तन में निहित है। जमींदार-जोतदार स्वामित्व के दिनों के मुकाबले फसलों की उत्पादन क्षमता किसानों के स्वामित्व के दौर में पांच गुना बढ़ गई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि हुई। कुपोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सृजन की समस्या अब भी है, पर अब बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जाती। ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढ़ी है, लेकिन शहरी क्षेत्रों से कम है। मध्याह्न भोजन योजना ने बच्चों को स्कूल जाने में मदद की है, भले ही मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता बहुत खराब है। संतोष राणा ने ठीक ही कहा है कि इन घटनाओं को नक्सलबाड़ी विद्रोह के परोक्ष प्रभावों के रूप में देखा जा सकता है।
जब आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ स्थानांतरित हो गया, तो इसका पतन हो गया। मुक्ति के नाम पर नक्सलियों ने ग्रामीण इलाकों में भी आतंक और हिंसा फैलाई। जब नक्सलवाद शहरों में पहुंचा, तो वर्ग शत्रु के नाम पर मध्यवर्गीय लोगों की भी बर्बरतापूर्वक हत्या की गई। वे यह भूल गए कि राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से नहीं निकलती। उन्होंने राष्ट्रवाद के लचीलेपन को पूरी तरह से गलत समझा।
यह सच है कि कम्युनिस्ट पार्टियां तेजी से हाशिये पर जा रही है और माओवादी भी विभिन्न गुटों और विचारधाराओं में बंट गए हैं। माओवादी हिंसा को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। अगर कुछ आदिवासी इलाकों में नक्सलियों की मौजूदगी है, तो इसके पीछे एक कारण यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्र का एक बड़ा जनसमुदाय दुख और अभावों में जीता है। इस खतरे को रोकने के लिए प्रधानमंत्री को प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उपाय तलाशने पर विचार करना चाहिए। इस समस्या से निपटे का एक बेहतर उपाय यह है कि हमारे सांविधानिक उदार लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर इसका समाधान ढूंढा जाए।