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हिमाचल को भी देखिए

रीतिका खेड़ा

Updated Wed, 16 Jul 2014 01:24 AM IST
Himachal model growth
लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात मॉडल की बहुत चर्चा हुई। सभी इसे अपनाना चाहते थे। इस मॉडल के नाम पर एक नारा जरूर है, मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस। लेकिन जब आप गुजरात की उपलब्धियों को देखें, तो यह मॉडल फीका पड़ने लगता है। जीडीपी की बढ़त दर के अलावा बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विकास के किसी पैमाने पर गुजरात पहले पांच राज्यों में नहीं है। दूसरी ओर, हिमालय में बसा, छोटा-पहाड़ी राज्य कहलाने वाला हिमाचल प्रदेश है, जिसकी उपलब्धियां मॉडल न सही, लेकिन काबिल-ए-तारीफ जरूर हैं।
पिछले कई वर्षों से हम हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों में जनसेवाओं पर अध्ययन करते आ रहे हैं। हर एक सर्वे में हिमाचल प्रदेश ऊंचे पायदान पर रहा है। प्राथमिक शिक्षा पर दस साल के अंतराल पर (1996-2006) किए गए प्रोब सर्वे की रिपोर्ट में हिमाचल में उत्साहित करने वाले नतीजे सामने आए। इसी तरह आईएचडीएस के 2004-05 के सर्वे में सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के पढ़ने, लिखने और घटाने (गणित) की परीक्षा ली गई। उसमें हिमाचल के बच्चे पढ़ने में पहले नंबर पर थे, लिखने में चौथे और घटाने में दूसरे नंबर पर। कांगड़ा और सिरमौर में वर्ष 2007 में किए गए मनरेगा सर्वे में हमने पाया कि इसके क्रियान्वयन में पंचायतों की अहम भूमिका है, महिलाओं की अच्छी भागीदारी है और भ्रष्टाचार भी कम है।

मंडी और सिरमौर में 2011 में जन वितरण प्रणाली का सर्वे हुआ। उसमें हिमाचल को नौ राज्यों में पहला दर्जा दिया गया। इसके तीन आधार थे-पहला, हिमाचल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली सबके लिए है। दूसरा, सरकारी दुकानों में न केवल सस्ता गेहूं-चावल मिलता है, बल्कि पौष्टिक दालें और खाद्य तेल भी दिया जाता है। तीसरा, जहां कुछ राज्यों में आधे से ज्यादा राशन की चोरी हो रही थी, वहीं हिमाचल में बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारियों को पिछले तीन महीनों में अपने हक का पूरा राशन मिला था। वर्ष 2013 में पांच योजनाओं (आंगनवाड़ी, मिड डे मील, मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा पेंशन) का सर्वे हुआ। इसमें तमिलनाडु के बाद हिमाचल प्रदेश दूसरे स्थान पर था। हाल ही में, शिमला के जुब्बल-कोटखाई ब्लॉक में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के अनौपचारिक सर्वे भी संतोषजनक थे।

हिमाचल में तंत्र कैसे काम करता है? हिमाचल की सफलता के पीछे सरकारी हस्तक्षेप का बड़ा हाथ रहा है। वहां सरकार ने विकास कार्यों में अग्रणी भूमिका अदा की है। बागवानी से वहां अच्छी आय होती है। आज भले ही यह निजी हाथों में है, पर पहले सरकार की इसमें प्रभावी भूमिका थी। किसानों तक उत्पादन की तकनीक पहुंचाने से लेकर बाजार में उत्पाद पहुंचाने तक राजकीय तंत्र ने काम किया। आज वहां लोग खुद मार्केटिंग करने लायक हो गए हैं, पर सरकारी मदद परोक्ष रूप से जारी है।

बीती सदी के सत्तर के दशक में स्वतंत्र राज्य बनते ही हिमाचल में शिक्षा और सड़कों को प्राथमिकता दी गई। शिक्षा के क्षेत्र में काम से ही हिमाचल में सफलता की नींव पड़ी। सड़क निर्माण के साथ सड़कों पर बसों को भी प्राथमिकता दी गई, ताकि शिक्षक और छात्र, दोनों स्कूल पहुंच सकें। हिमाचल प्रदेश में बसों का नेटवर्क हैरान करने वाला है। कई मैदानी राज्य ऐसे हैं, जहां पहाड़ी क्षेत्र का बहाना न होने के बावजूद रोड ट्रांसपोर्ट कॉपोरेशन ही नहीं है! जहां है, वहां जिले से ब्लॉक तक ही बस सेवा मिलेगी। निजी बस सेवाएं भी यह कमी पूरी नहीं कर पा रहीं। जबकि हिमाचल में दो हजार से ज्यादा रूटों पर बसें चलतीं हैं। वहां दूर-ऊंचे गांवों में भी बस आपको पहुंचा देगी। वहां बस सेवाओं की समय सारिणी का लगभग पालन भी किया जाता है।

हिमाचल में सामाजिक दूरी भी कम है, जिसका फल यह है कि डॉक्टर, शिक्षक, बस कंडक्टर अपनी रोजमर्रा की बातचीत में सभ्य रूप से पेश आते हैं। मुझे मुजफ्फरपुर का एक बढ़ई मिला, जिसने हाल ही में मुख्यमंत्री के यहां काम किया था। वह हैरान था कि वहां आम लोगों से मुख्यमंत्री मिलते हैं। जिन सड़कों पर बस सेवाएं कम हैं, वहां लोगों का अपनी गाड़ी में लिफ्ट देने के लिए गाड़ी रोकना आम बात है। जुब्बल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की एक एंबुलेंस टैक्सी यूनियन की ओर से थी। मशोबरा की आंगनवाड़ी सेविका को आंगनवाड़ी के लिए बहुत कुछ समुदाय की तरफ से मिलता रहता है।

ऐसा नहीं है कि हिमाचल में सब कुछ अच्छा ही है। वहां नए-पुराने गंभीर सामाजिक मुद्दे हैं। जाति-आधारित भेदभाव हिमाचल में हमारे सभी सर्वे में सामने आया। वहां आंगनवाड़ी में दलित सहायिका इसलिए खाना नहीं बनाती, क्योंकि ऊंची जाति के अभिभावकों को आपत्ति होगी। वहां मिड डे मील के लिए बच्चे घर से प्लेट लाते हैं। पर्यावरण पर आज हिमाचल प्रदेश में बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। रामपुर से किन्नौर तक, जहां बड़े हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर प्लांट बन रहे हैं, सतलुज में सीमेंट का पानी देखकर किसका दिल नहीं घबराएगा? वहां कृषि जमीन के बेनामी सौदे भी बहुत बढ़ गए हैं। जो राज्य सरकारी शिक्षा के बूते पर खड़ा हुआ, उसी सूबे में 2004-05 में 8-14 वर्ष की उम्र के बच्चों में 20 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में भर्ती थे।

जाहिर है, हिमाचल प्रदेश भी कुछ उन बुराइयों से अलग नहीं है, जो अन्य राज्यों में दिखती हैं। इन बुराइयों पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके बावजूद विकास के हिमाचल मॉडल की अनदेखी नहीं की जा सकती।

लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता और आईआईटी, दिल्ली से संबद्ध हैं।
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