इंफोसिस में उठा विवाद जारी, जानें क्यों नाराज हैं नारायणमूर्ति?
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देश की बड़ी आईटी कंपनियों में से एक इंफोसिस में उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सीनियर लेवल के अधिकारियों की लड़ाई पूरी तरह से सार्वजनिक हो गई है। एक बार फिर कंपनी के सह-संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। दरअसल, वे कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर प्रवीण राव को दिए गए कंपंसेशन हाइक से नाखुश हैं।
हालांकि, इससे पहले कंपनी के मतभेदों को अंदर ही रखने की अपील की गई थी, लेकिन दो महीने में दूसरी बार ये लड़ाई सार्वजनिक तौर पर हो रही है। ऐसा माना जा रहा है कि टाटा-मिस्त्री में हुई लड़ाई की बीमारी अब इंफोसिस में भी दिखने लगी है।
दरअसल, नारायणमूर्ति कंपनी में चल रहे मनमानी के माहौल से नाराज हैं। उन्होंने इसके खिलाफ कई बार आवाज भी उठाई है। प्रवीण की सैलरी के मामले में उनकी सैलरी बढ़ाकर 4.60 करोड़ कर दी गई। उन्होंने कहा कि ये बढ़ोत्तरी इंफोसिस की निष्पक्षता के खिलाफ है। जहां सामान्य कर्मचारियों को 6-7 फीसदी ही वृद्धि मिली ऐसे में कंपनी के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को इतनी वृद्धि देना मेरे विचार से सही नहीं है।
क्या है पूरी लड़ाई
इंफोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति, क्रिस गोपालकृष्णन व नंदन निलेकणी ने निदेशक मंडल से शिकायत की है कि कंपनी के भीतर कार्पोरेट गवर्नेंस के मानकों का पालन नहीं हो रहा है। सिक्का की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। सिक्का के पे-पैकेज (एक करोड़ दस लाख डॉलर सालाना) व सीएफओ राजीव बंसल को दिए जाने वाले 17 करोड़ के सेवरेंस को कंपनी के नियमों के खिलाफ बताया जा रहा है।
सेवरेंस की राशि वह रकम है जो कंपनी किसी कर्मचारी को निर्धारित समय से पहले अनुबंध खत्म करने पर देती है और यह अमूमन तीन महीने की होती है, लेकिन इस नियम की अनदेखी कर कंपनी के पूर्व लीगल हेड केनेडी को 12 महीने तो सीएफओ बंसल को 30 महीने का सेवरेंस पे दिया गया।
मूर्ति ने यह भी कहा है कि सिक्का के काम करने के तौर-तरीकों से कर्मचारियों में रोष हैं और उनके पास इस मामले में ई-मेल के जरिए कर्मचारियों की शिकायतें मिली हैं। कर्मचारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ा है। सूत्रों के मुताबिक संस्थापकों और कंपनी के बोर्ड के बीच चल रही आंतरिक लड़ाई के पीछे लगभग पांच अरब डॉलर की नगदी भी है। सूत्रों के मुताबिक कंपनी के संस्थापकों का कहना है कि इस नकदी का इस्तेमाल कंपनी के शेयरधारकों के हित में क्यों नहीं किया जा रहा है।