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डिजिटल के सही उपयोग से कृ‌षि अर्थव्‍यवस्‍था के लिए बड़ी भू‌मिका निभा सकती हैः अर‌विंद कुमार

अमित द्विवेदी, अमर उजाला, नई दिल्ली

Updated Thu, 09 Feb 2017 10:32 PM IST
Digital platform can play very important role in Indian economy

वर्तमान में करीब 141 मिलियन हैक्टेयर में खेती की जाती है, भारत का चीन जैसे देश के साथ बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था में गिना जाता है

भारतीय कृषि में कई प्रकार के भ्रामक विरोधाभास है। श्रम एवं रोजगार की दृष्टि से देखा जाए तो कृषि क्षेत्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। और फिर जहां इसके देश की जीडीपी में योगदान की बात आती है वह इस प्रतिस्पर्धा से दूर हो जाता है। वर्तमान में करीब 141 मिलियन हैक्टेयर में खेती की जाती है, भारत का चीन जैसे देश के साथ बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था में गिना जाता है, फिर भी अल्प उत्पादकता दर के कारण हमारा उत्पादन स्तर यहां तक कि जापान जैसे छोटे देश के करीब है। संख्या की दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी ट्रेक्टर निर्माता कम्पनी भारत में फिर भी हमारी मशीनीकरण पैठ काफी कम है।
यह कहना सच होगा कि मशीनकरण एकमात्र ऐसी संभावना है जो इन सारी भ्रामकताओं को भारतीय कृषि क्षेत्र में हमेशा के लिए समाप्त कर सकती है। उच्च मशीनीकरण होने से उत्पादकता भी बढ़ेगी और साथ ही उच्च स्तरीय आर्थिक योगदान भी किया जा सकेगा।
काफी लम्बे समय से भारतीय किसानो के लिए मशीनीकरण काफी दुर्लभ था, इसका सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होना है। छोटी सी जमीन का मालिक होने तथा लगातार भूमि की उर्वरकता को बनाए रखने के लिए छोटे और सीमान्त कृषक जो कि हमारे कृषक आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, उनके लिए ट्रैक्टर खरीदना काफी कठिन ही नहीं करीब-करीब असंभव सा है।
  
दुर्भाग्य से, भारत में बड़े खेतों के मालिकों के पास ही अपना ट्रैक्टर है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब 85 प्रतिशत किसान जो कि छोटे काश्तकार हैं, मशीनीकरण जरूरतों के लिए शेष 15 प्रतिशत बड़े किसानों पर निर्भर हैं। इससे स्वाभाविक है कि एक विशाल रेंटल बाजार स्वतः ही बन सकता है। कई छोटे किसान अपने खेतों की मशीनीकरण की जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य ट्रैक्टर मालिकों पर निर्भर रहता है।

भारत में एक बड़ी औपचारिक किराए की प्रथा मौजूद है, लेकिन उसकी अपनी समस्याएं हैं। गुणवत्ता मापदण्डों की कमी, समय का पालन नहीं करना, पुराने उपकरण, जाति एवं जमीन के आकार के आधार पर भेदभाव  जैसी कुछ समस्याएं हैं जो इस प्रथा के विकास में बाधक बनी हुई हैं। इन सभी समस्याओं के कारण दूसरी पीढ़ी के किसान शहरों की ओर पलायन कर गए हैं और खेतीबाड़ी छोड़ कर नौकरी कर रहे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार सिंचिंत क्षेत्र 141 से घट कर 137 मिलियन हैक्टेयर हो गया है।

सरकार का ध्यान किसानों की आय दुगुनी करने पर केन्द्रित है, खेती में मशीनीकरण को इसकी प्रमुख कुंजी कहा जा सकता है। कृषि उपकरणों के लिए कस्टम हायरिंग सेन्टर्स की स्थापना पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, साथ ही पूंजी निवेश पर सब्सिडी जैसे लाभ अगर मिलने लगे को निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों की प्रतिभागिता भी इस क्षेत्र में बढ़ सकती है, और यह कारोबार में भी सघन डिजीटल क्रांति देखने को मिल सकती है। अनेक निजी उद्यमी, बड़े किसानों के साथ ही निजी कम्पनियां कृषि उपकरण किराए पर देने के कारोबार एक बड़ा व्यापार मानती हैं और इससे किसानों के जीवन को बदलने का भी एक अवसर मिल सकता है।

समर्पित कृषि उपकरण किराए पर देने वाले केन्द्र, उच्च स्तरीय उपकरण प्रतिघंटा की दर से किराए के आधार पर किसानें को उपलब्ध करवा रहे हैं इसके साथ ही प्रशिक्षित एवं पेशेवर चालक एवं मैकेनिक्स भी उपलब्ध हैं जो कि भारत के छोटे किसानों के लिए किसी रामबाण से कम नहीं हैं। अब दूसरों पर निर्भर रहने के दिन गए। 


 
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