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पश्चिमी देशों से मुकाबला: अब नौजवानों को लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार कर रही है चीन की कम्युनिस्ट पार्टी

Sat, 04 Sep 2021 03:14 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

पर्यवेक्षकों का कहना है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ताजा रुख के पीछे असल कारण पश्चिमी देशों के साथ बढ़ता उसका टकराव है। पश्चिमी देशों ने बीते तीन वर्षों में हांगकांग और शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकारों के कथित दमन का मुद्दा उठा कर चीन को घेरने की कोशिश की है...
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शी जिनपिंग - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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चीन में चल रही बदलाव की ताजा लहर के बीच अब राष्ट्रपति शी जिनपिंग और सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने देश के नौजवानों का आह्वान किया है कि वे 'तमाम भ्रम छोड़ कर राष्ट्रीय संप्रभुता, सुरक्षा, और विकास की रक्षा के लिए संघर्ष करने को तैयार हो जाएं।' शी जिनपिंग ने बीते एक सितंबर को पार्टी के युवा और मध्य आयु वाले पदाधिकारियों की एक बैठक को संबोधित किया। उसमें उन्होंने कहा- ‘फिलहाल दुनिया में ऐसे गहरे बदलावों की गति तेज हो गई है, जैसा पिछली एक सदी में नहीं देखा गया। उससे चीनी राष्ट्र का कायाकल्प एक महत्वपूर्ण दौर में पहुंच गया है।’

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पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि शी जिनपिंग के इस भाषण से ठीक पहले चीन में नौजवानों के वीडियो गेम्स खेलने की सीमा तय कर दी गई। अब 18 साल के कम उम्र के नौजवान हफ्ते में सिर्फ तीन घंटे वीडियो गेम खेल सकेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के नौजवान अब करियर में सफलता और अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने को ज्यादा तरजीह देते हैं। सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी उससे हटा कर नौजवानों को राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है।

कुछ विश्लेषकों ने इसकी तुलना 1960 के दशक में चीन में शुरू की गई सांस्कृतिक क्रांति से की है। उस समय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ दे दुंग ने नौजवानों से आह्वान किया था कि वे अंधविश्वास और भूत-प्रेत में यकीन करने जैसी बातों से उबर कर पार्टी के भीतर बढ़ रही कथित पूंजीवादी प्रवृत्ति पर हमला बोल दें। साथ ही तब माओ ने पश्चिमी देशों के खिलाफ देश में जोरदार माहौल बनाया था। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि माओ ने भूत-प्रेत शब्द का इस्तेमाल एक उपमा के रूप में किया था, जिसका मतलब पश्चिमी पूंजीवाद था।

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पर्यवेक्षकों का कहना है कि शी के भाषण के पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने देश में बदल रहे माहौल का संकेत दिया। बीते 29 अगस्त को सरकारी मीडिया में एक टिप्पणी प्रकाशित की गई। उस टिप्पणी के लेखक ली गुआंगमान ने कहा कि चीन को अब बड़े पूंजीपतियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। वरना, चीन भी उसी तरह बिखर जाएगा, जैसा सोवियत संघ के साथ हुआ। कुछ विशलेषकों ने कहा है कि ये टिप्पणी और फिर शी का भाषण ‘सांस्कृतिक क्रांति 2.0’ की शुरुआत का संकेत है।

अपने भाषण में शी ने नौजवानों पार्टी अधिकारियों से कहा कि वे गंभीर अध्ययन करें और ज्यादा से ज्यादा अच्छी किताबें पढ़ें। वे उनका सार लेकर जनता के बीच जाएं और जो अनुभव होता है, उस पर विचार करें। शी ने नौजवानों से कहा- ‘मिस्टर गुड’ बने रहने के बजाय वे संघर्ष करने का साहस जुटाएं।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ताजा रुख के पीछे असल कारण पश्चिमी देशों के साथ बढ़ता उसका टकराव है। पश्चिमी देशों ने बीते तीन वर्षों में हांगकांग और शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकारों के कथित दमन का मुद्दा उठा कर चीन को घेरने की कोशिश की है। उसके जवाब में कम्युनिस्ट पार्टी नौजवानों को ‘राजनीतिक सोच से लैस’ कर संघर्ष के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही है।
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