पर्यवेक्षकों का कहना है कि शी के भाषण के पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने देश में बदल रहे माहौल का संकेत दिया। बीते 29 अगस्त को सरकारी मीडिया में एक टिप्पणी प्रकाशित की गई। उस टिप्पणी के लेखक ली गुआंगमान ने कहा कि चीन को अब बड़े पूंजीपतियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। वरना, चीन भी उसी तरह बिखर जाएगा, जैसा सोवियत संघ के साथ हुआ। कुछ विशलेषकों ने कहा है कि ये टिप्पणी और फिर शी का भाषण ‘सांस्कृतिक क्रांति 2.0’ की शुरुआत का संकेत है।
अपने भाषण में शी ने नौजवानों पार्टी अधिकारियों से कहा कि वे गंभीर अध्ययन करें और ज्यादा से ज्यादा अच्छी किताबें पढ़ें। वे उनका सार लेकर जनता के बीच जाएं और जो अनुभव होता है, उस पर विचार करें। शी ने नौजवानों से कहा- ‘मिस्टर गुड’ बने रहने के बजाय वे संघर्ष करने का साहस जुटाएं।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ताजा रुख के पीछे असल कारण पश्चिमी देशों के साथ बढ़ता उसका टकराव है। पश्चिमी देशों ने बीते तीन वर्षों में हांगकांग और शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकारों के कथित दमन का मुद्दा उठा कर चीन को घेरने की कोशिश की है। उसके जवाब में कम्युनिस्ट पार्टी नौजवानों को ‘राजनीतिक सोच से लैस’ कर संघर्ष के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही है।