इस टिप्पणी में कहा गया है- ‘विडंबना यह है कि बाइडन ने बदला लेने का जो संकल्प जताया, उसमें 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश के जताए संकल्प की झलक मिली। बुश ने कहा था कि ये लड़ाई दूसरों की शर्तों पर और उनके चुने समय के मुताबिक शुरू हुई है। लेकिन यह हमारे चयन के मुताबिक खत्म होगी। लेकिन बाइडन के संकल्प से यह साबित नहीं हुआ कि बुश ने जो वादा किया था, वह पूरा हुआ है।’
दूसरे विश्लेषकों ने कहा है कि बाइडन ने अफगानिस्तान में अमेरिकी मिशन उस स्थिति में खत्म किया है, जब उनके प्रशासन का उद्देश्य सिर्फ अफगानिस्तान से अमेरिकी लोगों को सुरक्षित निकाल लेना भर रह गया है। वहां आतंकवाद को जड़ से खत्म करने का अमेरिका सरकार का वादा वे पूरा नहीं कर पाए हैं। 20 साल तक अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान में बने रहने के बाद हालत यह है कि अमेरिका अपने लोगों की सुरक्षा के लिए भी उसी संगठन पर निर्भर दिख रहा है, जिसकी सरकार को हटाने के लिए वहां हमला किया गया था।
मगर बाइडन समर्थकों का कहना है कि पिछले तीन राष्ट्रपतियों की नाकामी का ठीकरा वर्तमान राष्ट्रपति के सिर फोड़ा जा रहा है। उनका कहना है कि अफगानिस्तान में अमेरिका अपने मकसद में कई वर्ष पहले ही नाकाम हो चुका था। फिर अमेरिकी फौज लौटाने का तालिबान के साथ समझौता पूर्व डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने किया था। बाइडन ने उसी फैसले को आगे बढ़ाया है। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नाकामी चाहे जिसकी भी हो, इससे अमेरिका की छवि खराब हुई है। अफगानिस्तान में स्थिति जितनी बिगड़ेगी, लोग महाशक्ति के रूप में अमेरिका की क्षमता पर उतने ही अधिक सवाल उठाने लगेंगे।