ईरान की पुलिस में एक नैतिक सुरक्षा प्रभाग भी है। उसके कर्मचारी हिजाब नियमों का उल्लंघन करने वाली महिलाओं की भी निगरानी करते हैं। कई बार इस दौरान उनके हिंसक ढंग से पेश आने की शिकायतें भी आती रही हैं। ऐसे कोई फोटो या वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं, जिनमें इन कर्मचारियों को महिलाओं को पीटते हुए या उन्हे अपमानित करते दिखाया गया। वैसे आम तौर पर नियम तोड़ने वाली महिला को उससे यह हलफनामा भरवाने के बाद छोड़ दिया जाता है कि वह आगे ऐसा नहीं करेगी।
उरमिया की घटना के बाद से ईरान में सोशल मीडिया पर हिजाब नियमों को लेकर तीखी बहस चल रही है। इस दौरान कई लोगों ने ये दलील दी है कि हिजाब एक धार्मिक सलाह है, जिसकी व्याख्या अपने ढंग से की जा सकती है। उनके मुताबिक कई इस्लामी देशों में ऐसा ही प्रावधान है। लेकिन ईरान में सरकार का समर्थन ऐसे चरमपंथी गुटों या व्यक्तियों के साथ रहता है, जो सड़कों पर हिजाब नियम तोड़ने वाली महिलाओं को फटकार लगाते हैं या उन पर फब्तियां कसते हैं।
महिला अधिकार संगठनों के मुताबिक ऐसी घटनाओं का महिलाओं के मनोविज्ञान पर बहुत बुरा असर होता है। पीड़ित महिलाएं भीतर से टूट जाती हैं। आलोचकों का कहना है कि इराक, लेबनान और सीरिया जैसे देशों में भी आबादी का बड़ा हिस्सा ईरान की तरह ही शिया मुसलमानों का है। लेकिन वहां महिलाओं की आजादी पर वैसी रोक नहीं है, जैसा ईरान में थोपा जाता है। कई विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की सरकार हिजाब नियमों में ढील देने के लिए इस डर से भी तैयार नहीं होती कि उस हाल में लोग दूसरी आजादियां भी मांगने लगेंगे। अमेरिका की नॉर्थ-ईस्टर्न इलिनोइस यूनिवर्सिटी में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फरजानाह ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘कभी-कभी हिजाब जैसी साधारण सी चीज भी वह पैमाना बन जाती है, जिससे लोग यह समझ सकते हैं कि किसी देश में जनता पर सरकार का किस हद तक नियंत्रण है।’