एस जयशंकर और वांग यी (फाइल फोटो)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले के प्राचीर से चीन को अप्रत्यक्ष तौर पर संदेश देने के बाद चीन के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं। इसी के चलते सोमवार को लंबे समय के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने एलएसी और तिब्बत का दौरा किया। यह दौरा इसलिए भी शक पैदा करता है क्योंकि आमतौर पर चीन के शीर्ष नेता तिब्बत का दौरा तब तक नहीं करते, जब तक कोई बहुत ही महत्वपूर्ण काम न हो।
माना जा रहा है कि हाल में गलवान घाटी में हुई हिंसा के मद्देनजर वांग यी ने तिब्बत का दौरा किया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति का जायजा लेने के दौरान वांग यी ने राजनयिकों से साथ मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए काम करने का आग्रह किया। पांच साल बाद अचानक तिब्बत का दौरा करने वाले चीनी विदेश मंत्री वांग यी आखिर कौन हैं? आइए जानते हैं उनके बारे में सब कुछ...।
अफ्रीकी और एशियाई भाषाओं के जानकार
अक्तूबर, 1953 में बीजिंग में पैदा हुए वांग यी लंबे समय से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे हैं। एशियाई और अफ्रीकी भाषा में ग्रेजुएशन करने वाले वांग यी के पास अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री भी है। 1969 में उन्होंने अपनी पहली नौकरी की थी। इसके बाद मई, 1981 में वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) से जुड़े। उन्हें जापानी भाषा और संस्कृति का भी अच्छा ज्ञान है। माना जाता है कि वह जापानी नागरिकों से भी अच्छी जापानी भाषा बोल सकते हैं। वह चीन के उप विदेश मंत्री और जापान में चीनी राजदूत भी रह चुके हैं।
डोकलाम विवाद में भी निभाई थी अहम भूमिका
जानकारी के मुताबिक भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के कार्यकाल में वांग यी को सीमा विवाद पर बात करने के लिए विशेष प्रतिनिधि बनाया गया था। हालांकि शुरुआत में दिवंगत सुषमा स्वराज के साथ उनकी चर्चा बहुत सकारात्मक नहीं रही थी। डोकलाम विवाद में चीन की ओर से वांग यी ने काफी सख्त रूप दिखाने की कोशिश की थी। मगर बाद में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में भी वांग यी ने अहम भूमिका निभाने की कोशिश की थी।
आठ साल तक घर छोड़ना पड़ा
चीन के अन्य नेताओं की तरह वांग यी को माओ सांस्कृतिक आंदोलन के भागीदार के तौर पर घर छोड़ना पड़ा। वह आठ साल तक मंगोलिया में बेहद सर्द माहौल में रहे। 1969 से 77 के बीच एक कंपनी में उन्होंने कर्मचारी, संदेशवाहक, पब्लिसिटी सेक्रेटरी के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्हें वापस बीजिंग बुलाया गया और डाक व संचार मंत्रालय के खुफिया रिसर्च संस्थान में जिम्मेदारी सौंपी गई।