इसे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की बड़ी कामयाबी समझा गया है कि उन्होंने जी-7 समूह को नाम लेकर चीन की आलोचना करने के लिए राजी कर लिया। शनिवार तक ऐसे संकेत थे कि जर्मनी और फ्रांस इसके लिए सहमत नहीं थे। वे चाहते थे कि बिना चीन का नाम लिए जबरिया मजदूरी, मानवाधिकार हनन, कोरोना वायरस की उत्पत्ति की नए सिरे से पूरी जांच, दक्षिण चीन सागर में मुक्त नौवहन, आदि मुद्दों को साझा बयान में शामिल किया जाए। लेकिन रविवार को जारी हुई संयुक्त विज्ञप्ति में इन सभी मसलों के साथ चीन का उल्लेख किया गया।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के मुताबिक जी-7 के नेताओं ने साझा विज्ञप्ति को अंतिम रूप देने के लिए डेढ़ घंटे की खुली धूप में बैठक की, जहां फोन, वाई-फाई आदि मौजूद नहीं थे। इसका मसकद उस बैठक को हैकिंग से बचाना था। वहां चीन के सवाल पर संतुलित बयान जारी करने को लेकर बातचीत हुई। अधिकारियों के हवाले से छपी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जी-7 नेताओं की राय यह थी कि वे चीन से पूरी तरह नाता नहीं तोड़ सकते। जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर उन्हें उसका साथ लेना होगा। इसलिए बयान की भाषा ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे चीन से संवाद ही टूट जाए।
खबरों के मुताबिक इस सिलसिले में सबसे अहम रोल इटली के प्रधानमंत्री मारियो द्राघी ने निभाया। द्राघी यूरोपीय सेंट्रल बैंक के प्रमुख रह चुके हैं और अभी जी-20 के अध्यक्ष हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के प्रति इटली का रुख सख्त हुआ है। इटली की इसके पहले की सरकार ने इटली को चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल किया था। साल 2000 से 2019 तक चीन ने इटली में 15.9 अरब यूरो का निवेश किया। इससे इटली पर उसका प्रभाव बढ़ा था। लेकिन ऐसी धारणा है कि गठबंधन सरकार का नेता होने की सीमाओं के बावजूद द्राघी ने इटली को चीन से दूर किया है। इसलिए उनकी बातों को जी-7 शिखर बैठक में वजन दिया गया।
इन रिपोर्टों के मुताबिक द्राघी ने ध्यान दिलाया कि जल्द ही वे जी-20 की बैठक की अध्यक्षता करेंगे। उसमें चीन भी भाग लेगा। इसलिए बयान ऐसा होना चाहिए, जिससे उनके लिए असहज स्थिति ना बने। आखिरकार ऐसी भावनाओं का ख्याल करते हुए अमेरिका ने अपना रुख कुछ नरम किया। बयान में चीन की आलोचना की गई, लेकिन शब्दों को नरम रखा गया।
विश्लेषकों के मुताबिक चीन की आलोचना से ज्यादा अहम इस बैठक में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का जवाब देने के लिए वैकल्पिक बुनियादी ढांचा परियोजना लागू करने का जताया गया इरादा है। इसके लिए जी-7 देशों को राजी कर जो बाइडन ने दुनिया के सामने यह साबित करने का इरादा जताया है कि पश्चिम का उदारवादी पूंजीवाद चीन के ‘राजकीय पूंजीवाद’ से बेहतर मॉडल है। अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशंस के विश्लेषक जेनिफर हिलमैन ने द गार्जियन से कहा कि व्हाइट हाउस ने अमेरिका के अंदर मजबूत सप्लाई चेन बनाने, मैनुफैक्चरिंग में फिर से ताकत झोंकने और व्यापक आधार वाले आर्थिक विकास की एक रणनीति पिछले हफ्ते जारी की थी। जी-7 बैठक में उसे वैश्विक रूप दिया गया है। इसे बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड (फिर से बेहतर दुनिया बनाओ) नाम दिया गया है।
इससे बाइडन जी-7 के नेताओं में ये भरोसा बंधाने में कामयाब रहे कि अमेरिका ने फिर से दुनिया का नेतृत्व संभाल लिया है। मगर असल सवाल संसाधनों का आएगा। इसका कोई ब्योरा अभी नहीं दिया गया है कि इस वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना के लिए कौन देश कितना धन देगा। इस सिलसिले में निजी क्षेत्र से बहुत उम्मीद जोड़ी गई है। लेकिन उसे इससे जोड़ना एक कठिन चुनौती साबित हो सकता है।