अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स के प्रस्ताव को अमली जामा पहनाने के लिए बातचीत में जुटे अधिकारियों का मनोबल पिछले हफ्ते बढ़ा। ऐसा अमेरिका की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने के यूरोपियन यूनियन के फैसले पर अमेरिका के नरम रुख अख्तियार कर लेने से हुआ। इससे दोनों पक्षों के बीच जारी एक बड़ा विवाद दूर हो गया। इसके बावजूद नई टैक्स व्यवस्था को लागू करने की तैयारियों में जुटे अधिकारी आशंकित हैं। उन्हें भरोसा नहीं है कि अमेरिका इसके लिए होने वाली वैश्विक संधि के प्रावधानों को 2023 तक अपने यहां लागू कर पाएगा।
वैश्विक संधि की तैयारी में धनी देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के अधिकारी जुटे हुए हैं। उनकी चिंता का कारण अमेरिका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति है। उनके मुताबिक जो बाइडन प्रशासन संधि पर दस्तखत करेगा। लेकिन संधि को अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में वह मंजूरी दिलवा पाएगा, इसकी संभावना कम है। विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी प्रस्तावित संधि का जोरदार विरोध कर रही है। सीनेट में बिना उसके समर्थन के संधि से संबंधित बिल का पारित होना असंभव माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अभी सूरत यह है कि अमेरिका ‘आधा इस संधि के अंदर है और आधा बाहर है।’ अगर यही हालत बने रहे तो फिर बहुत से दूसरे देश भी आधे मन से ही इस संधि में शामिल होंगे। वे उन प्रावधानों को जारी रखेंगे, जिनके तहत कम टैक्स दर से उन्हें फायदा होता है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में टैक्स कानून के प्रोफेसर रिउवेन अवी-योनाह ने वेबसाइट पॉलिटिको.कॉम से कहा- ‘अगर वैश्विक संधि नहीं हो पाई, जो भारत जैसे देश डिजिटल टैक्स लगाने पर विचार करेंगे। उस हाल में ऐसे देश एकतरफा कदम उठाना जारी रखेंगे।’
जानकारों का कहना है कि अब भले दुनिया के ज्यादातर देशों के बीच न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स की वैश्विक दर तय करने पर सहमति बन गई हो, लेकिन अमेरिका में अनिश्चितता के कारण प्रस्तावित संधि अभी भी अधर में लटकी हुई है। रिपब्लिकन पार्टी नई व्यवस्था पर सहमत नहीं होगी, यह साफ हो चुका है।