संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी ने शुक्रवार को कहा कि म्यांमार में 10 लाख से अधिक लोगों को वित्तीय संकट के कारण खाद्य मदद मिलना बंद हो जाएगी। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) ने एक बयान में बताया कि म्यांमार में वितरित की जा रही राशन अप्रैल में बंद हो जाएगी। देश में सैन्य सरकार और सशस्त्र विद्रोही समूहों के बीच भीषण संघर्ष के कारण एक गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है।
डल्ब्ल्यूएफपी ने कहा कि म्यांमारा में खाद्य मदद जारी रखने के लिए उसे करीब 492 करोड़ रुपये (60 मिलियन डॉलर) की जरूरत है और उसने अपने साझेदारों से अतिरिक्त धन जुटाने की अपील की है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी मदद पर नब्बे दिनों की रोक लगाई है, जिससे म्यांमार में शरणार्थियों को मिलने वाली सेवाओं में कमी आ गई। इसके कारण थाईलैंड के शरणार्थी शिविरों में अस्पताल सेवाएं भी बंद हो गईं, जहां एक लाख से ज्यादा शरणार्थी रह रहे हैं।
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म्यांमार में संघर्ष फरवरी 2021 में तब शुरू हुआ था, जब सेना ने आंग सान सू की की चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटा दिया और लोकतांत्रिक शासन की वापसी की मांग करने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबा दिया। डब्ल्यूएफपी के बयान के मुताबिक, म्यांमार की करीब एक तिहाई आबादी यानी 1.2 करोड़ लोग अपनी न्यूनतम दैनिक खाद्य जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं और 23 लाख लोग भूख के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
डब्ल्यूएफपी ने कहा कि वह केवल 35 हजार सबसे कमजोर लोगों की मदद कर पाएगा, जिनमें पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं और विकलांग लोग शामिल हैं। डब्ल्यूएफपी के म्यामांर में प्रतिनिधि माइकल डनफोर्ट ने कहा, यह कमी देश के उन सबसे कमजोर समुदायों पर विनाशकारी असर डालेगी, जो पूरी तरह से डब्ल्यूएफपी की मदद पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, डब्ल्यूएफपी म्यांमार के लोगों की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन जरूरतमंदों तक पहुंचने के लिए तत्काल वित्तीय मदद जरूरी है।
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यह कटौती करीब एक लाख आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों को भी प्रभावित करेगी, जिनमें म्यांमार के पश्चिमी प्रांत रखाइन में रोहिंग्या समुदाय भी शामिल है, जिन्हें डब्ल्यूएफपी की मदद के बिना भोजन नहीं मिलेगा। बौद्ध बहुल म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, जिनका लंबे समय से उत्पीड़न हो रहा है। अगस्त 2017 में म्यांमार की सेना ने अंक अभियान शुरू किया, जिसके बाद सात लाख से ज्यादा रोहिंग्या बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में चले गए थे। हिंसा बढ़ने के बाद और अधिक लोग बांग्लादेश और अन्य देशों में भाग रहे हैं।
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