मंगलवार को जर्मनी के चांसलर ओलफ शूल्ज मास्को पहुंचे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से चर्चा हुई और दुनिया ने राहत की सांस ली। सभी को उम्मीद है कि रूस अब यूक्रेन पर हमला नहीं करेगा। रूस ने भी यूक्रेन की सीमा पर तैनात अपनी सेना की संख्या में कटौती करने की घोषणा कर दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के बोरिस जॉनसन ने भी राहत की सांस ली है। अभी यह पता नहीं चल पाया है कि रूस ने यह कदम किस भरोसे पर उठाया है। लेकिन तमाम आशंकाओं के बीच इस नए बदलाव से पूरी दुनिया को मंहगाई और युद्ध की स्थिति में पैदा होने वाली अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता जैसे हालात से बच जाने के आसार हैं। खासकर, भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह एक अच्छी स्थिति होगी।
यूक्रेन संकट के चलते अमेरिका में मंहगाई दर बढ़कर 7.5 फीसदी तक पहुंच गई और नए मंडराते संकट ने महाशक्ति को चिंतित कर दिया था। अमेरिकी शेयर बाजार भी सोमवार को बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ था। रूस के राष्ट्रपति पुतिन की सभी सुविधाओं वाली नौका जर्मनी में मरम्मत के लिए गई थी और बिना पूरी मरम्मत के समय से पहले ही रूस के लिए रवाना हो गई। दोनों संदेश दुनिया में आग की तरह फैले। यह यूक्रेन पर रूस के हमले और जवाब में अमेरिका की अगुआई में पश्चिमी देशों की रूस पर कार्रवाई की आशंका पैदा कर रहा था। हालांकि अंतरराष्ट्रीय सामरिक विशेषज्ञों को भी दोनों महाशक्तियों के टकराने पर संदेह था।
भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह कहते हैं कि अमेरिका, रूस दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। फ्रांस, ब्रिटेन के पास भी परमाणु हथियार हैं। इसलिए रूस की कार्रवाई और जवाबी कार्रवाई दोनों ही बहुत आसान नहीं रहने वाली थी। इसमें कई देशों पर सीधा गंभीर असर पड़ता। इस टकराव की आंच में यूरोप के देश आ जाते। भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कदाचित टकराव होता तो यह यूरोप, अमेरिका की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत जैसे विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता। क्योंकि प्राकृतिक गैस, ईधन तेल आदि के दामों में भारी उछाल आने की प्रबल संभावना थी। वाशिंगटन से नीलेश सिंह ने बताया कि अमेरिका और यहां के बाजारों में रूस के साथ बढ़ने वाले टकराव की संभावना महसूस की जाने लगी थी, लेकिन मंगलवार की सुबह अच्छी खबर लेकर आई है।
अभी रूस ने यूक्रेन सीमा पर तैनात अपनी सेना की संख्या में कटौती करने की घोषणा की है, लेकिन इसका मतलब खतरा टल जाना भी नहीं है। अभी रूस और पश्चिमी देशों में कूटनीतिक वार्ता का दौर चलेगा। रूस चाहता है कि यूक्रेन को नाटो देशों में शामिल न किया जाए। इसके अलावा उसके आसपास के देशों को भी नाटो के प्रभाव से मुक्त रखा जाए। रूस इसे अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता मानता है। नाटो प्रमुख जेंस स्टोलेबर्ग ने भी कूटनीति के लिहाज से रूस के कदम को सकारात्मक बताया है। अमेरिका के रक्षामंत्री ऑस्टिन लॉयड बेल्जियम की यात्रा पर हैं। ऑस्टिन की यात्रा का मकसद नाटो के सदस्य देश पोलैंड, लिथुआनिया से चर्चा है। इसी तरह से रूस के विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव भी कूटनीतिक रास्ते तलाशने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे थे। ऐसे में माना जा रहा है कि वैश्विक स्तर के शिखर नेता अब समस्या के समाधान की तरफ अपने प्रयासों को तेज करेंगे।