सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का औपचारिक रूप से विभाजन हो गया है। इस खबर से नेपाल में किसी को अचरज नहीं हुआ। उसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहल के गुटों का टकराव इस हद तक बढ़ गया था कि सबको इसका पहले से अंदाजा लग गया था। इसकी वजह यह भी है कि जब 2018 में ओली और दहल गुटों का विलय हुआ था, तभी किसी गंभीर पर्यवेक्षक को उम्मीद नहीं थी कि ये एकता ज्यादा दिन चलेगी।
मंगलवार को पार्टी के विभाजन के बाद पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य मणि थापा ने यहां एक अखबार से कहा- ‘पार्टी के इस मुकाम पर आने का पहला और सबसे बड़ा कारण यह है कि जब विलय हुआ था तब वह विचारधाराओं की एकता नहीं थी। विलय की वजहें अलग थीं। तब सीपीएन (यू-एम-एल) में ओली और (माधव कुमार) नेपाल के बीच लगातार टकराव चल रहा था। पूर्व माओवादियों के अंदर अपनी समस्याएं थीं। किसी अन्य पार्टी की तरह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में भी आंतरिक लोकतंत्र का अभाव रहा है और साथ ही जो सबसे अहम बात है कि नेपाली कम्युनिस्टों को अभी भी यह नहीं मालूम है कि सरकार कैसी चलाई जाती है।’
जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यू-एम-एल) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) का विलय हुआ, तब पार्टी में दो अध्यक्ष पदों की व्यवस्था की गई। दोनों अध्यक्षों को समान अधिकार दिए गए। दोनों गुटों ने इस पर विचार नहीं किया कि क्या दोनों गुटों के हजारों कार्यकर्ता विलय के लिए तैयार हैं। विश्लेषकों का कहना है कि दोनों गुटों ने महज सत्ता को ध्यान में रखते हुए विलय किया। सत्ता में दोनों गुटों को समान हिस्सा ना मिलने के कारण 31 महीनों बाद अब पार्टी टूट गई है। लेकिन दोनों गुटों ने अपने पुराने नाम को फिर से नहीं अपनाया है। बल्कि दोनों ने दावा किया है कि वे ही असली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी हैं।
ओली और दहल गुटों में किसे असली पार्टी के रूप में मान्यता मिले, यह देश का निर्वाचन आयोग तय करेगा। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की पहली बैठक मई 2018 में हुई थी। तब कमेटी में 441 सदस्य थे। नेपाल के राजनीतिक दल अधिनियम के मुताबिक जिस किसी गुट के साथ सेंट्रल कमेटी के 40 फीसदी और संसदीय दल के 40 फीसदी सदस्यों का समर्थन हो, वह खुद को नई पार्टी के रूप में रजिस्टर करा सकता है। किस पार्टी के पास कितने सदस्यों का समर्थन है, इस बारे में उनके दावों पर फैसला निर्वाचन आयोग करता है।
पुष्प कमल दहल दो बार देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। ओली के साथ उनके संबंध पहले से अच्छे नहीं रहे हैं। 2016 में ओली ने उन्हें सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया था। जबकि उसके पहले दोनों नेताओं में ये समझौता हुआ था कि वे सत्ता की साझेदारी करेंगे। जब ओली ने सत्ता नहीं सौंपी, तब दहल ने नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। माधव कुमार नेपाल और झलानाथ खनाल जैसे कम्युनिस्ट नेता भी तब उसी गठबंधन में शामिल हो गए थे। 2018 में कम्युनिस्ट गुटों का फिर विलय हुआ, लेकिन ओली ने लगातार दहल और नेपाल जैसे नेताओं को हाशिये पर रखने की कोशिश की।
इसी कारण दहल और नेपाल गुटों ने हाथ मिला लिए। दोनों गुटों ने धीरे-धीरे पार्टी की सभी प्रमुख समितियों में अपना बहुमत बना लिया। इनमें पार्टी सेक्रेटेरियट, स्टैंडिंग कमेटी और सेंट्रल कमेटी शामिल हैं। खुद अल्पमत में पाकर ओली ने कई ऐसे कदम उठाए, जिससे उन्हें सियासी नुकसान पहुंचा। इनमें संवैधानिक परिषत अधिनियम और राजनीतिक दल अधिनियम में संशोधनों के लिए अध्यादेश जारी करना भी था। इनका देश में जबर्दस्त विरोध हुआ। तब ओली को कदम वापस खींचने पड़े। लेकिन उनके इन सब कार्यों से पार्टी में दरार चौड़ी होती गई।
मंगलवार को दोनों गुटों ने सेंट्रल कमेटी की अलग-अलग बैठक की। इनमें उन्होंने अपने विरोधी नेताओं को पार्टी से निकलने के प्रस्ताव पास कराए। इस तरह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का औपचारिक विभाजन हो गया। इसके साथ ही नेपाल में गहरा राजनीतिक अनिश्चय पैदा हो गया है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसका फायदा लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता विरोधी ताकतें उठा सकती हैं।