राष्ट्रपति के इस कदम के बाद हुए एक जनमत सर्वे में 84 फीसदी लोगों ने उनके कदम का समर्थन किया। ये सर्वे एमरहोड नाम की एजेंसी ने किया। गौरतलब है कि दस साल पहले ट्यूनिशिया से शुरू हुआ लोकतंत्र समर्थक आंदोलन कई देशों में फैल गया था। उसे अरब स्प्रिंग (यानी अरब वसंत) कहा गया था। उनमें मिस्र जैसे देश में सत्ता परिवर्तन भी हुआ। लेकिन मिस्र में तानाशाही फिर से लौट आई। सीरिया और यमन जैसे देशों में गृह युद्ध शुरू हो गया। ट्यूनिशिया उनके बीच अपवाद था। उसे अरब स्प्रिंग के बीच सफलता की एकमात्र कहानी कहा जाता था। लेकिन इस बीच देश में गरीबी बढ़ी। इससे ऐसा लगता है कि लोगों के बीच लोकतंत्र का आकर्षण खत्म हो गया है।
चाय बेचने का काम करने वाली आलिया कालिये ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘मुझे लोकतंत्र या स्वतंत्रता के खो जाने का कोई डर नहीं है। जब नेता हमारा शोषण करते हैं और हमारी जिंदगी को तबाह करते हैं, तो उसे आजादी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि अगर बेन अली सत्ता में रहते, तो हमारी आज जैसी हालत नहीं होती।’
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि राष्ट्रपति अपनी निजी तानाशाही कायम करने की फिराक में हैं। मगर ऐसा लगता है कि विपक्ष के आरोपों पर जनता ध्यान नहीं दे रही है। अमेरिका की न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में ट्यूनिशिया की विशेषज्ञ मोनिका मार्क्स ने कहा है कि राष्ट्रपति सईद शायद मिस्र की तरह अपनी पूरी तानाशाही कायम नहीं कर पाएंगे। लेकिन दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रपति सईद लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुंचा चुके हैं।