कतर की राजधानी दोहा में भले ही बहुप्रतीक्षित अफगानिस्तान सरकार और आतंकी समूह तालिबान के बीच शांति वार्ता शुरू हो गई हो, मगर अमन कायम होने की राह आसान नहीं दिखती। दरअसल, अमेरिका की पहल पर शांति वार्ता शुरू तो हो गई, मगर तालिबानियों के हमले बढ़ गए हैं।
अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता फवाद अमन ने कहा, शांति वार्ता शुरू होने के साथ ही हम उम्मीद कर रहे थे कि तालिबान अपने आतंकी हमलों में कमी लाएगा, मगर दुर्भाग्य से ये हमले कम होने की बजाय और बढ़ गए। उन्होंने कहा, जब कतर में शुक्रवार को वार्ता हो रही थी, उसी दौरान अफगानिस्तान सरकार के सुरक्षा बलों और प्रतिष्ठानों पर 18 हमले किए गए।
शनिवार को भी बड़ी संख्या में हमलों को अंजाम दिया गया। इस वार्ता में भारत समेत कई देशों के प्रतिनिधियों ने वर्चुअली हिस्सा लिया और तालिबान को फौरन संघर्षविराम की घोषणा करने को कहा, ताकि दशकों से हिंसा की आग में झुलस रहे अफगानिस्तान और तालिबान में सार्थक समझौता हो जाए।
हालांकि, वार्ता में तालिबान ने संघर्षविराम के बारे में कुछ नहीं कहा। अफगानिस्तान शांति परिषद के प्रमुख अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने कहा, हमारी पहली प्राथमिकता महत्वपूर्ण रूप से हिंसा में कमी आए और स्थायी तौर पर संघर्षविराम लागू हो।
भारत की प्रतिबद्धता के लिए हमेशा आभारी रहेगी अफगान सरकार
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेशमंत्री मोहम्मद हनीफ आतमार ने कहा है कि अफगानिस्तान के प्रति भारत की एकजुटता और प्रतिबद्धता के लिए अफगानिस्तान सरकार हमेशा आभारी रहेगी। उन्होंने विदेशमंत्री एस जयशंकर के अफगानिस्तान में शांति को समर्थन देने पर ट्वीट करते हुए यह बात कही।
अमेरिका अफगानी लोगों के हितों की रक्षा करेगी
अफगानिस्तान में सुलह के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि राजदूत जालमे खलीलजाद ने कहा है कि दोहा में हो रही शांति वार्ता में अमेरिका अफगानी लोगों के हितों की रक्षा करेगी। उन्होंने कहा, अफगानिस्तान संकट को खत्म करने के लिए हर हाल में समाधान की ओर पहुंचना होगा।
भारत के लिए बातचीत क्यों अहम?
अफगानिस्तान में करीब 1700 भारतीय हैं जो वहां की बैंकिंग, सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों में काम करते हैं। एक समझौते के तहत भारत ने अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। अफगानिस्तान का नया संसद भवन बनाने के अलावा भारत वहां पर बांध, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पताल बना रहा है।
साथ ही भारत अफगानिस्तान को कृषि, विज्ञान, आईटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी सहयोग दे रहा है। 2016 के समझौते के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगान सीमा तक ट्रेन चलाने की योजना है। ऐसे में यह शांति वार्ता विफल रहती है या उसके नतीजे भारत के अनुकूल नहीं रहते, तो भारत के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।