बीते शनिवार को न्यूजीलैंड में एक दिन में कोरोना संक्रमण के सबसे ज्यादा नए मामले सामने आने का रिकॉर्ड बना। उस दिन देश में 160 नए मामले सामने आए। कोरोना महामारी की शुरुआत से ही न्यूजीलैंड ने जीरो कोविड की नीति अपनाई थी। इसके तहत संक्रमण का एक भी केस सामने आने पर सीमा बंद करने, सख्त क्वॉरंटीन, सामूहिक टेस्टिंग और लंबी अवधि के लॉकडाउन लागू करने के उपाय अपनाए गए। यह नीति कारगर रही। न्यूजीलैंड में कोविड-19 संक्रमण के इक्का-दुक्का मामले ही सामने आए थे।
लेकिन ढिलाई के साथ पिछले हफ्ते संक्रमण के मामलों में तेज बढ़ोतरी ने प्रधानमंत्री जेसिंडा ऑर्डेन की सरकार की आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने ढिलाई की जो नीति अपनाई है, उसका सबसे ज्यादा नुकसान मूलवासी माओरी समुदाय और अन्य अल्पसंख्यक समूहों को होगा। न्यूजीलैंड में दूसरे समुदायों की तुलना में माओरी समुदाय में गरीबी ज्यादा है। स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच भी कम है। माओरी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि सरकार की ढिलाई की नीति बहुत से माओरी लोगों की मौत का कारण बनेगी।
अब तक न्यूजीलैंड उन देशों में है, जहां कोविड-19 के कारण प्रति व्यक्ति मृत्यु दर सबसे कम है। लेकिन अब सरकार ने जो अनुमान लगाए हैं, उनके मुताबिक अगले वर्ष संक्रमण और मौतों की संख्या बढ़ सकती है। इसकी वजह सरकार की जीरो कोविड-19 खत्म करने की योजना है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस नीति पर अनिश्चित समय तक नहीं चला जा सकता।
सरकार के मेडिकल सलाहकारों का कहना है कि टीकाकरण की ऊंची दर की वजह से संक्रमण के मामले कम रहेंगे। जो संक्रमण से ग्रस्त होंगे, उनमें भी इसके गंभीर लक्षण नहीं उभरेंगे। सरकार के सलाहकार डॉ. जेफ लॉव ने एनबीसी से कहा- ‘कोविड संक्रमण का शिकार हुए 90 से 95 फीसदी लोगों को अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक जेसिंड ऑर्डेन सरकार लंबे समय तक चले लॉकडाउन की वजह से भी आलोचना झेल रही थी। जन संगठनों का कहना था कि लॉकडाउन का कम आय वाले तबकों पर बहुत खराब असर हुआ है। ऑकलैंड स्थित संस्था चाइल्ड पॉवर्टी एक्शन ग्रुप का दावा है कि लॉकडाउन के कारण 18 हजार से ज्यादा बच्चे गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं।