विश्लेषकों का कहना है कि ईरान को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल करना मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में उभर रही नई व्यवस्था का सूचक है। ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान की हाल की घटनाओं से उसे तुरंत पूर्ण सदस्यता देने का मन एससीओ में शामिल देशों ने बनाया है। ईरान के अफगानिस्तान के साथ पुराने सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं। साथ ही वह उन देशों में है, जहां सबसे ज्यादा अफगान शरणार्थी रह रहे हैं। औपचारिक रूप से रजिस्टर्ड सात लाख 80 हजार अफगान शरणार्थी वहां हैं। गैर-रजिस्टर्ड शरणार्थियों की संख्या 20 लाख तक बताई जाती है।
एससीओ में इस समय आठ पूर्ण सदस्य हैं। चीन, रूस, ताजिकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गीजिस्तान और उज्बेकिस्तान इसके संस्थापक सदस्य हैं। भारत और पाकिस्तान को बाद में इसमें शामिल किया गया था। बेलारुस और मंगोलिया एससीओ में पर्यवेक्षक के रूप में शामिल हैं। इसके अलावा कई देश इस संगठन के डायलॉग पार्टनर हैं। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस संगठन में ज्यादातर देश ऐसे हैं, जो अमेरिका विरोध रुख रखते हैं या रूस और चीन जैसे अमेरिका विरोधी देशों के प्रभाव में हैं। ईरान के संबंध भी अमेरिका के साथ लगातार तनावपूर्ण रहे हैं।
ईरान एक शिया इस्लामिक देश है। अमेरिका ने उसे आतंकवाद के प्रायोजक देशों की श्रेणी में डाल रखा है। उसके साथ परमाणु करार के मुद्दे पर चल रही अमेरिका की बातचीत फिलहाल गतिरोध का शिकार है। ऐसे में ईरान के लिए एससीओ से जुड़ना बड़े फायदे की बात होगी। विश्लेषकों के मुताबिक लेकिन एससीओ की छवि अमेरिका विरोधी देशों के जमावड़े के रूप में बन सकती है। भारतीय रक्षा विशेषज्ञ हर्ष वी पंत ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘ईरान भी एक अर्थ में उसी खेमे में है, जिसमें चीन और रूस हैं। वह भी अमेरिका विरोधी है। इस वजह से वह लगातार चीन और रूस के साथ संबंध मजबूत बनाता गया है।’