ब्रिटिश सरकार ने हाल संकटग्रस्त रेलवे नेटवर्क को फिर से सरकारी नियंत्रण में लाने का एलान किया। हालांकि बोरिस जॉनसन सरकार की योजना के मुताबिक अब भी रेलवे के संचालन में प्राइवेट सेक्टर की बड़ी भागीदारी बनी रहेगी। सरकारी योजना के मुताबिक रेलवे के संचालन के लिए एक नई सार्वजनिक संस्था बनाई जाएगी। उसका नाम ग्रेट ब्रिटिश रेलवेज रखा जाएगा। उसके जिम्मे ट्रेनों के टाइमटेबल, टिकट की कीमत और रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रबंधन से संबंधित काम होंगे। निजी क्षेत्र को ये संस्था ही ट्रेनों को चलाने के लिए अनुबंध जारी करेगी। जॉनसन सरकार ने कहा है कि उसकी इस योजना से रेल यात्रियों को लाभ होगा। गौरतलब है कि ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण 1990 के दशक में किया गया था। अब उसे एक नाकाम प्रयोग माना जाता है। इसीलिए जॉनसन सरकार अब उसके ढांचे में बड़ा परिवर्तन करने जा रही है।
कुछ पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि यूरोपियन यूनियन (ईयू) के नियमों के तहत रेलवे नेटवर्क को सरकार के नियंत्रण में लाना मुश्किल था। ब्रेग्जिट के बाद अब ब्रिटिश सरकार ऐसा करने की स्थिति में है। लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि ईयू संधि की धारा 93 के तहत परिवहन क्षेत्र को सरकारी सब्सिडी देना मान्य है। ईयू के कई देशों ने इस नियम का लाभ उठाया है। लेकिन ब्रिटेन सरकार ने ईयू में रहते हुए ऐसा नहीं किया।
पिनसेंट मेसॉन लॉ फर्म में इन्फ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ जनाथन हार्ट ने टीवी चैनल यूरो न्यूज से कहा- ‘हाल में उठाए गए कदम में ईयू के नियम रुकावट नहीं थे। लेकिन अब उठाए गए कदम को ब्रेग्जिट के लाभ के रूप में बताना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद है।’ गौरतलब है कि ब्रिटेन में रेलवे संबंधी समीक्षा की प्रक्रिया 2018 में ही शुरू कर दी गई थी। ब्रिटिश एयरवेज के पूर्व सीईओ कीथ विलियम्स की अध्यक्षता में कराई गई उस समीक्षा का निष्कर्ष रहा कि रेल यात्री सेवाओं को फ्रेंचाइजी आधार पर चलाना नाकाम प्रयोग साबित हुआ है। उन सेवाओं को चलाने वाली कंपनियों को उबारने के लिए बार-बार सरकार को सहायता देनी पड़ी है।
हार्ट ने कहा कि अब कोरोना महामारी के कारण उठाए गए आपात कदमों के तहत रेलवे के सीमित राष्ट्रीयकरण को भी पेश किया जा रहा है। महामारी के दौरान यात्रियों की संख्या घट गई। तब परिवहन विभाग ने फ्रेंचाइजी संबंधी मौजूदा अनुबंधों को रद्द कर दिया।
पर्यवेक्षकों ने कहा है कि ईयू के भीतर कई ऐसे देश हैं, जहां रेलवे का संचालन वहां की सरकार करती है। फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, इटली और पोलैंड उन देशों में शामिल हैं। लक्जमबर्ग ने तो अपने यहां मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था कर रखी है। ऐतिहासिक रूप से सभी ईयू देशों में रेलवे सरकार के अधीन ही थी। लेकिन बाद में कई देशों में उसका सीमित या पूरा निजीकरण किया गया।
थिंक टैंक बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने 2017 में यूरोपियन रेलवे परफॉर्मेंस इंडेक्स बनाया था। उसमें कहा गया थ कि रेलवे सिस्टम का कुल प्रदर्शन सार्वजनिक लागत पर निर्भर करता है। यानी सरकार इस सिस्टम में जितना निवेश करती है और जिस मात्रा में सब्सिडी देती है, उससे यह तय होता है। उस इंडेक्स में सबसे ऊपरी स्थान पर स्विट्जरलवैंड, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्वीडन और फ्रांस आए थे। इन सभी जगहों पर रेलवे सरकार के अधीन है।
ब्रिटेन में वर्षों से रेलवे सेवाएं महंगाई, अकुशलता, लेटलतीफी और अत्यधिक भीड़ की समस्या से ग्रस्त रही हैं। अब उनका समाधान ढूंढा जा रहा है। ब्रिटेन के परिवहन मंत्री ग्रांट शेप्स ने हाल में कहा- ‘हमारे देश में रेलवे का निर्माण देश की सेवा, समुदायों के बीच संपर्क गहरा बनाने, और लोगों को सस्ती, विश्वसनीय और तीव्र सेवाएं देने के लिए हुआ था। वर्षों से जारी भ्रम और अति जटिलताओं के कारण ये दृष्टि धुंधली हो गई है और यात्रियों के साथ अन्याय हुआ है।’ विश्लेषकों का कहना है कि क्या ताजा कदम से इन मसलों का हल निकलेगा, उसे देखने पर पूरे यूरोप और दुनिया की निगाहें टिकी रहेंगी।