सामरिक विश्लेषकों ने आगाह किया है कि अफगानिस्तान पर काबिज दहशतगर्दों की मांगें नहीं मानी गईं तो एयरपोर्ट पर कब्जे के लिए खूनखराबा होने की आशंका है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका की ओर से 2012 में प्रतिबंधित हक्कानी नेटवर्क देश के नए शासक तालिबान का अटूट अंग है।
अमेरिकी सुरक्षा पेशेवरों के समूह क्लीयरेंस जॉब्स की रिपोर्ट में सामरिक विश्लेषक जेसन क्रिस हॉक लिखते हैं, इन दहशतगर्दों के हाथों अगले कुछ हफ्तों में कई बेकसूर लोगों की जान जाने का खतरा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इनामी आतंकी खलील हक्कानी की काबुल में मौजूदगी हालात बिगड़ने की तरफ इशारा करता है।
इससे पहले सत्ता हस्तांतरण के लिए वार्ता कर रहे अफगानिस्तान के पूर्व चीफ एग्जीक्यूटिव अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने भी साफ किया है कि हक्कानी को काबुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है।
क्लीयरेंस जॉब्स के मुताबिक, अब्दुल्ला ने हाल ही में पुल-ए-खेश्ती मस्जिद में एक बैठक में भाग लिया था, जहां सैकड़ों लोगों ने तालिबान के साथ वफादारी की कसम ली थीं।
हॉक के मुताबिक, हक्कानी से विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की उम्मीद हास्यास्पद होगा। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान को अलग-थलग करके सीमित करने का रास्ता नहीं तलाशा गया तो भयानक खूनखराबा होगा।
सीआईए की मदद से खड़ा हुआ तालिबान
1990 के दशक में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने भरपूर आर्थिक मदद देकर हक्कानी नेटवर्क के जरिये सोवियत बलों से लड़ने के लिए तालिबानी लड़ाके तैयार किए थे। हालांकि, 9/11 के हमले के बाद हालात बदल गए और अमेरिकी धन पर पलकर खड़ा हुआ तालिबान ही अमेरिका के लिए चुनौती बनने लगा।
अमेरिका के खिलाफ हमले करने के लिए तालिबान की तरफ से अल कायदा को भरपूर मदद मिली थी। बाद में अमेरिका ने अल कायदा और तालिबान को खत्म करने के लिए अफगानिस्तान में अपनी सेना उतारी। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल कायदा तो लगभग खत्म हो गया। लेकिन मुल्ला उमर की गैर मौजूदगी के बाद भी तालिबान बना रहा, असल में इसके पीछे हक्कानी नेटवर्क की ताकत थी।
माजरा क्या है
अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे को मान्यता देने के लिए रास्ते निकालने की कोशिश शुरू कर दी है। इससी क्रम में अमेरिका ने तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को अलग-अलग संगठन बताया है। जब कि पूरी दुनिया को तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के रिश्तों के बारे में पता है। यही नहीं, अब काबुल को हक्कानी नेटवर्क ही चला रहा है।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने शुक्रवार को कहा, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क अलग-अलग संगठन हैं। तालिबान के साथ जानकारी साझा करने और वे जानकारियां हक्कानी तक पहुंचने के सवाल पर प्राइस ने कहा, हक्कानी नेटवर्क आतंकी समूह है और तालिबान से अलग है। अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्क को 2012 में आतंकी समूह घोषित किया था। नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के मुताबिक, यह अमेरिकी और गठबंधन फौजों पर हमले करता रहा है।
खलील पर 50 लाख डॉलर का इनाम
अमेरिका ने खलील पर 50 लाख डॉलर का इनाम रखा हुआ है। हक्कानी नेटवर्क के नेता सैदुल्लाह जान, याह्या हक्कानी, मुहम्मद उमर जादरान, कारी अब्दुल रऊफ और इब्राहिम हक्कानी पर या तो अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंध हैं या फिर वे मोस्ट वांटेड सूची में शामिल हैं।
पाकिस्तानी सेना का करीबी सहयोगी
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि खलील लगातार पाकिस्तान सेना के रावलपिंडी मुख्यालय पर जाता रहा है। वह तालिबान और अल-कायदा के बीच पुल का काम करता है।