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Sri Lanka Crisis: श्रीलंका आईएमएफ की शर्तों को मानें या नहीं, अब है ये तय करने की विकट चुनौती

Mon, 11 Jul 2022 05:10 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

आंदोलनकारियों के एक समूह ने खुला पत्र जारी कर चेतावनी दी है कि नई सरकार आईएमएफ की शर्तों को मान कर जनता की मुश्किलें न बढ़ाए। इस पत्र में जिक्र किया गया है कि आईएमएफ ने सरकारी उद्यमों के बड़े पैमाने निजीकरण और जनता पर टैक्स बढ़ा कर राजकोषीय सेहत बहाल करने की शर्त रखी है...
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Sri Lanka Crisis - फोटो : ANI
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विस्तार
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श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को सत्ता से हटाने के बाद अब आंदोलनकारियों के एक हिस्से ने प्रस्तावित सर्वदलीय सरकार के सामने अपना मांग पत्र रखा है। उधर श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के अधिकारियों की यूनियन ने भी देश को मौजूदा संकट से उबारने के लिए अपने सुझाव अगली सरकार के लिए पेश किए हैं। पर्यवेक्षकों के मुताबिक ये दोनों सुझाव परस्पर विरोधी हैं। ये देश में मौजूद अलग-अलग नजरिए की नुमाइंदगी करते हैं। इसलिए समझा जाता है कि अगली सरकार के लिए आर्थिक कार्यक्रम तय करना आसान नहीं होगा।

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श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर्स यूनियन कहा है कि देश में तुरंत राजनीतिक स्थिरता बहाल कर सख्त राजकोषीय उपाय लागू करने की जरूरत है। साथ ही नई सरकार को तुरंत आर्थिक सुधार को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज मिलने का रास्ता साफ हो सके। यूनियन ने एक बयान में कहा- ‘हमें उम्मीद है कि नया प्रशासन आईएमएफ से कर्ज पाने की राह में रुकावट नहीं बनेगा। मौजूदा आर्थिक संकट से देश को निकालने के लिए यही सबसे महत्त्वपूर्ण विकल्प है।’

शर्ते मानी तो बढ़ेंगी लोगों की मुश्किलें

दूसरी तरफ आंदोलनकारियों के एक समूह ने खुला पत्र जारी कर चेतावनी दी है कि नई सरकार आईएमएफ की शर्तों को मान कर जनता की मुश्किलें न बढ़ाए। इस पत्र में जिक्र किया गया है कि आईएमएफ ने सरकारी उद्यमों के बड़े पैमाने निजीकरण और जनता पर टैक्स बढ़ा कर राजकोषीय सेहत बहाल करने की शर्त रखी है। इस समूह ने कहा है कि ऐसा करने का परिणाम बड़े पैमाने पर रोजगार खत्म होने, औसत वेतन में गिरावट, पानी और बिजली के शुल्क में बढ़ोतरी, और जन कल्याण के कार्यों में और कटौती के रूप में सामने आएगा। उससे पहले से ही मुसीबत में पड़े लोगों की मुश्किलें और बढेंगी।

सोशल इक्वैलिटी पार्टी नामक इस समूह ने बैंकों, बड़ी कंपनियों, चाय बगानों आदि का राष्ट्रीयकरण करने और उत्पादन एवं वितरण के ऊपर सरकारी नियंत्रण कायम करने की मांग की है। इस समूह ने विदेशी व्यापार को भी सार्वजनिक नियंत्रण में लाने और अरबपतियों के धन को जब्त कर राजकोषीय सेहत बहाल करने की मांग सामने रखी है। खुले पत्र में कहा गया है कि किसानों, छात्रों और छोटे कारोबारियों के सारे कर्ज तुरंत माफ किए जाने चाहिए और श्रमिकों की कार्यस्थिति में सुधार के कदमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस समूह ने उत्पादन में स्थानीय जरूरतों को तरजीह देने की मांग भी की है।

आंदोलनकारियों के तमाम गुटों में वैचारिक एकता नहीं

पर्यवेक्षकों के मुताबिक राजपक्षे परिवार को सत्ता से हटाने के लिए एकत्र हुए आंदोलनकारियों के तमाम गुटों में वैचारिक एकता नहीं है। उनमें बड़ी संख्या ऐसे समूह भी शामिल हैं, जो आईएमएफ से कर्ज लेकर समस्या से तुरंत राहत चाहते हैं। बैंक अधिकारियों की यूनियन भी उनमें एक है। इस यूनियन ने भी नौ जुलाई के जनप्रतिरोध का समर्थन किया था, जिस दिन प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति के निवास कोलंबो फोर्ट में घुस गए। यूनियन ने कहा है कि श्रीलंकाई मुद्रा को ढहने से बचाना नई सरकार का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए। इसलिए बिजली शुल्क में बढ़ोतरी जैसे राजकोषीय आमदनी को बढ़ाने वाले कदम उठाने होंगे।

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समझा जाता है कि नई सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती देश में परस्पर विरोधी नजरिए की वकालत कर रही ताकतों के बीच न्यूनतम आम सहमति बनाने की होगी। ऐसा करने में वो नाकाम रही, तो श्रीलंका में शांति की बहाला एक मुश्किल चुनौती साबित होगी।

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