आर्थिक संकट के बावजूद श्रीलंका में गुरुवार को पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया और महिंदा राजपक्षे के भतीजे सहित 37 कनिष्ठ मंत्रियों की नियुक्ति कर दी गई है जिससे अब एक बार फिर से विवाद खड़ा हो गया है। बता दें कि 1948 में अपनी स्वतंत्रता के बाद से श्रीलंका अपने सबसे खराब आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जो विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी के कारण उत्पन्न हुआ था। देश में 2.2 करोड़ लोग अभी भी आवश्यक वस्तुओं के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं। लेकिन कैबिनेट में इतने मंत्रियों को जगह मिलने से अब कई सवाल उठ रहे हैं।
विपक्ष ने राष्ट्रपति के इस कदम की कड़ी निंदा की है। विपक्ष का कहना है कि जब देश अपने सबसे खराब आर्थिक संकट से गुजर रहा है, तब सरकार ऐसे विस्तार को बर्दाश्त नहीं कर सकती है। हाल ही में कर वृद्धि ने लोगों पर बोझ डाला है और विक्रमसिंघे कैबिनेट विस्तार कर बोझ और बढ़ा रहे हैं।
रिश्तेदारों को भी मिली जगह
राज्य स्तर के मंत्रियों में नियुक्ति अधिकांश कनिष्ठ मंत्री या विधायक सत्तारूढ़ श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (एसएलपीपी) पार्टी से थे। कुछ मंत्री पूर्व राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के भी शामिल हुए।राष्ट्रपति के मीडिया विभाग ने एक बयान में कहा कि नए राज्य मंत्रियों ने राष्ट्रपति सचिवालय में राष्ट्रपति के समक्ष शपथ ली। जबकि सांसद रंजीत सियाम्बलपतिया और शेहान सेमासिंघे ने वित्त मंत्रालय में राज्य के मंत्रियों के रूप में शपथ ली थी, वहीं गोटबाया और महिंदा राजपक्षे के भतीजे शशिंद्र राजपक्षे, सिंचाई मंत्रालय में नियुक्त किए गए।
आईएमएफ की कर्ज घोषणा के बावजूद दूर नहीं हुई हैं श्रीलंका की मुश्किलें
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) 2.9 बिलियन डॉलर का कर्ज मंजूर कर देने के बावजूद श्रीलंका की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। खुद आईएमएफ ने ये चेतावनी दी है कि अगर कर्ज चुकाने की समयसीमा तय करने (डेट रिस्ट्रक्चरिंग) के फॉर्मूले पर बाकी कर्जदाता देश राजी नहीं हुए, तो श्रीलंका का संकट और गहरा सकता है। समझा जाता है कि इस मामले में पश्चिमी कर्जदाताओं और चीन के बीच सहमति बनाना मुश्किल काम है।
आईएमएफ ने यह साफ कर दिया है कि 2.9 बिलियन डॉलर के कर्ज का भुगतान वह तभी शुरू करेगा, जब कर्जदाता देशों के बीच ऋण रिस्ट्रक्चरिंग पर सहमति बन जाएगी। पर्यवेक्षकों के मुताबिक आईएमएफ अभी सिर्फ शुरुआती तौर पर ही कर्ज देने पर राजी हुआ है। असल भुगतान के रास्ते में अभी रुकावटें हैं। आईएमएफ की टीम के प्रमुख पीटर ब्रिउअर ने यहां कहा- ‘अगर कोई एक या कई कर्जदाता देश ऐसे आश्वासन देने पर राजी नहीं हुए, तो वास्तव में श्रीलंका का संकट और गहराएगा। उस स्थिति में श्रीलंका की कर्ज भुगतान क्षमता पर शक बना रहेगा।’