एनबीसी के मुताबिक अमेरिकी अधिकारी अफगानिस्तान में फैले भ्रष्टाचार को लेकर काफी समय से चिंतित थे। उन्हें इसका अहसास था कि भ्रष्टाचार के कारण निचले दर्जे के सैनिकों को उचित वेतन और खाने-पीने की चीजें नहीं मिल पाती हैं। लंदन स्थित थिंक टैंक- सेंटर फॉर स्टडी ऑफ आर्म्ड ग्रुप्स की सह-निदेशक एशले जैकसन के मुताबिक तालिबान ने अफगान सेना में संसाधनों, नेतृत्व और संकल्प-शक्ति की कमी का फायदा उठाया। जैकसन ने कहा- आप तमाम तरह से क्षमता निर्माण कर सकते हैं, हर तरह की चीजों की सप्लाई कर सकते हैं। लेकिन अगर सिस्टम काम ना कर रहा हो, अगर वह भ्रष्ट हो और उसे उचित राजनीतिक नेतृत्व ना मिले, तो बाकी चीजें काफी साबित नहीं होतीं।
विशेषज्ञों के मुताबिक हर प्रांत या शहर में अपनी जीत को तालिबान ने ‘कब्जा’ बताया। इसके पीछे उसका मकसद ये संदेश देना था कि इसके लिए उसे कोई बड़ी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी। इससे अफगान बलों का मनोबल गिरता गया। आखिर में उन्होंने तालिबान से समझौता करके उसके सामने हथियार डाल दिए।
लेकिन बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है कि आखिर अमेरिका को इन बातों की भनक क्यों नहीं लगी? खुफिया एजेंसियों में जिसकी आशंका जताई थी, वह यह थी कि तालिबान 11 सितंबर से पहले काबुल पहुंच सकता है। लेकिन वह ऐसा 15 अगस्त को ही कर लेगा, इसकी दूर-दूर तक किसी ने कल्पना नहीं की थी।