यूक्रेन पर हमले के बाद लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों का जवाब देने के लिए रूस ने एक ऐसा कदम उठाया है, जैसा पिछले एक सदी में किसी देश ने नहीं किया। उसने बौद्धिक संपदा अधिकारों को निशाना बनाया है। हालांकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस महीने के आरंभ में ही इस संबंध में आदेश जारी कर दिया था, लेकिन उसके दूरगामी परिणामों को अब समझा जा रहा है।
पश्चिमी मीडिया की चर्चाओं में इसे बौद्धिक चोरी (इंटेलेक्चुअल पाइरेसी) को वैध करना बताया गया है। पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस में ऐसी चोरी पहले से की जा रही थी। पिछले साल अमेरिका सरकार ने रूस को निगरानी वाले देशों की सूची में डाल दिया था। इस सूची में उन देशों को रखा जाता है, जिनके बारे में शक होता है कि वे अमेरिकी कंपनियों की बौद्धिक संपदा का पर्याप्त संरक्षण नहीं कर रहे हैँ।
व्लादिमीर पुतिन ने हालिया कदम पश्चिमी देशों की तरफ से रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के जवाब में उठाया है। जानकारों का कहना है कि पिछली एक सदी में किसी देश ने बौद्धिक संपदा पर ऐसा हमला किया हो, उसकी कोई मिसाल नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जरूर अमेरिका ने अपने दुश्मन देशों की कंपनियों की कॉपीराइट और पेटेंट अधिकारों का पालन न करने के लिए ट्रेडिंग विथ इनमी एक्ट बनाया था। युद्ध के बाद पराजित जर्मन कंपनियों को अपने ट्रेड मार्क अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस की कंपनियों को देने के लिए मजबूर किया गया।
अब रूसी अधिकारियों ने कहा है कि पश्चिमी कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों का उनके देश में जल्द ही उल्लंघन शुरू हो जाएगा। इससे रूसी कंपनियां कई उत्पादों को सस्ते में अपने देश के उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवा पाएंगी। पुतिन के आदेश जारी करने के बाद एक ब्रिटिश कंपनी ने उसे एक रूसी कोर्ट में चुनौती दी। लेकिन कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।