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चुनाव से पहले ही तय हो जाती है हार-जीत!

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दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जहां पर चुनाव होने से पहले ही हार-जीत को तय कर लिया जाता है।
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बांग्लादेश में क़दम रखते ही एक बात साफ़ समझ में आ जाती है। पांच जनवरी को होने वाले आम चुनावों में सत्ताधारी अवामी लीग सरकार की वापसी तय से भी ज़्यादा है।

क्योंकि विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी समेत सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों ने इन चुनावों का बहिष्कार कर रखा है।

बांग्लादेश में संसदीय सीटों की संख्या 300 है जिसमें से 153 सीटों पर तो शेख़ हसीना की पार्टी के ख़िलाफ़ उम्मीदवार ही नहीं हैं।

विपक्षी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की बीएनपी पार्टी की सहयोगी क्लिक करें जमात-ए-इस्लामी सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने में जुटी रही है जिससे चुनाव टालें जा सकें, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है।
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अब सवाल यही उठता है कि आख़िर इन चुनावों, जिनमें चुनौती के नाम पर कुछ भी नहीं, की वैधता क्या और कितनी है।

विपक्ष की नेता ख़ालिदा ज़िया अपने ही घर में नज़रबंद हैं।

ग़ौर करने वाली बात है कि जिन आम चुनावों को लेकर दुनिया कि नज़रें क्लिक करें बांग्लादेश पर टिकी हैं उनके होने के पहले ही लगभग 150 लोग इनके विरोध के सिलसिले में अपनी जान गँवा चुके हैं।

राजधानी ढाका कि सड़कों पर जितने साधारण लोग दिखते हैं उतने ही सुरक्षा कर्मी और फ़ौजी भी।

भय का मंज़र इस क़दर है कि टैक्सी सेवा वाले अपनी महँगी गाड़ियों को सड़कों पर निकालने से इसलिए डर रहे हैं जिससे उन्हें हिंसा कि चपेट से बचाया जा सके।

प्रमुख विपक्षी पार्टी बीएनपी की नेता एक तरह से घर में ही नज़रबंद बताई जा रही हैं, हालांकि उनसे मिलने उनके घर पर ही अमरीका के राजदूत और राजनयिक लगातार आ जा रहे हैं।
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भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह कुछ दिन पहले दल-बल के साथ आकर पूर्व राष्ट्रपति इरशाद से मिलकर जा चुकी हैं जिससे वे चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाएं, लेकिन यात्रा विफल रही।

चुनावों के दौरान हिंसक माहौल का यातायात सेवाओं पर व्यापक असर हुआ है।

चिंता इस बात पर है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना कि अवामी लीग सरकार का देश के दूर-दराज़ के इलाक़ों पर से नियंत्रण कम होता जा रहा है।

विपक्षी पार्टियां एक के बाद एक हड़ताल और बंद का आह्वान कर रहीं है जिससे हिंसा भी भड़क रही है और जानें भी जा रहीं हैं।

इसका विपरीत असर यातायात सेवाओं पर पड़ने के अलावा बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।

विदेशी निवेशक चुप्पी साध कर बैठे हैं और कारोबारियों का माल गोदामों में धूल खा रहा है।

जानकारों का मत है कि इस राजनीतिक प्रभुत्व की लड़ाई में पिछले एक महीने के भीतर ही देश को कई हज़ार करोड़ रुपए का नुक़सान हो चुका है।
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