इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन की सेहत काफ़ी ख़राब हो गई है। उनके चिकित्सकों का कहना है कि उनकी हालत इतनी गंभीर है कि 'कुछ हद तक उनके जीवन को भी ख़तरा' है।
चिकित्सकों के मुताबिक उनकी किडनी सहित कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया है। शेरॉन की उम्र 85 साल है।
वह 2001 में इजरायल के प्रधानमंत्री बने और 2005 में उन्हें एक हल्का स्ट्रोक पड़ा। इसके बाद 2006 में उन्हें एक बड़ा दौरा पड़ा और वह कोमा में चले गए। तब से वह लगातार निष्क्रिय अवस्था में हैं।
अरियल शेरॉन की सेहत की जानकारी देते हुए टेल हाशोमर अस्पताल के प्रोफेसर जीव रोटस्टाइन ने बताया, "पिछले कुछ दिनों में हमने अरियल शेरॉन के महत्वपूर्ण अंगों में क्रमिक गिरावट देखी है।" साथ ही उन्होंने यह कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री का जीवन "खतरे" में है।
परिवार का साथ
इस समय शेरॉन का परिवार उनके साथ है। उनके एक बेटे ने यरूशलम पोस्ट को बताया, "हमें उम्मीद है, हमें हमेशा उम्मीद रही है।"
शेरॉन 1948 में इजरायल के गठन के बाद हुए सभी युद्धों में शामिल रहे हैं और कई इजरायली उन्हें एक महान सैन्य नेता मानते हैं। दूसरी ओर फलस्तीनियों की राय उनके बारे में अच्छी नहीं है।
बाद के वर्षों में शेरॉन ने शांति की स्थापना के लिए प्रयास किए
वर्ष 1967 और 1973 के युद्ध में शेरॉन ने जिस डिवीज़न की अगुवाई की, उसने इजरायल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
उन्होंने 1982 में रक्षा मंत्री रहते हुए लेबनान पर हमले की योजना बनाई, जहां से फलस्तीनी मुक्ति संगठन के जरिए इजरायल पर गोलाबारी की जा रही थी।
आक्रमण के दौरान लेबनान के ईसाई सैनिकों ने इजरायल के साथ मिलकर इजरायल के नियंत्रण वाले बेरूत शरणार्थी शिविर में सैकड़ों फलस्तीनियों को मारा।
विचारों में बदलाव
बाद में इजरायल ने इस घटना की जांच के आदेश दिए। इस दौरान शेरॉन ने इस जनसंहार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।
इसके बावजूद वह 18 साल बाद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने सुरक्षा और सच्ची शांति हासिल करने की शपथ ली और इस ध्येय के लिए दूसरा दौरा पड़ने तक काम करते रहे।
शेरॉन अधिग्रहीत फलीस्तीनी क्षेत्र में यहूदी बस्तियों के निर्माण को बढ़ावा देने के इच्छुक थे। उन्होंने विवादित पश्चिमी तट घेरे के निर्माण की शुरुआत भी की।
लेकिन 2005 में इजरायल में उग्र विरोध के बावजूद उन्होंने ग़ज़ा पट्टी से इजरायली सैनिकों को वापस बुलाने की एकतरफा घोषणा कर दी।
इस साल उन्होंने अपनी लिकुड पार्टी को छोड़कर मध्यमार्गी कदीमा पार्टी के गठन की घोषणा की। साथ ही उन्होंने दोबारा चुनाव में जाने का एलान भी कर दिया। इस दौरान ही उन्हें स्ट्रोक का सामना करना पड़ा और तबसे वह निष्क्रिय अवस्था में हैं।