मनी लॉन्ड्रिंग ब्लैक लिस्ट में डाले जाने पर म्यांमार के आम लोगों की जिंदगी और बदहाल हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस कदम का असर यह होगा कि म्यांमार को मिलने वाली विदेशी सहायता पर रोक लग जाएगी। उससे पहले ही बदहाल उसकी अर्थव्यवस्था और ज्यादा कमजोर हो जाएगी। मनी लॉन्ड्रिंग की निगरानी करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था- फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की जून में हुई बैठक में उत्तर कोरिया और ईरान के साथ-साथ म्यांमार को भी काली सूची में डालने पर लगभग सहमति बन गई थी।
काले धन से संबंधित जांच और इसके बारे में नीति संबंधी सलाह देने वाली एजेंसी इलिसिट फाइनेंस पॉलिसी की निदेशक जुसत्यना गुडजोवस्का के मुताबिक एफएटीएफ की काली सूची में जाने के बाद म्यांमार के कई बैंक अंतरराष्ट्रीय सिस्टम से बाहर हो जाएंगे। उन्होंने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा कि यह एक बेहद अहम कदम है, जिसे हलके से नहीं लिया जाना चाहिए। इस कदम के गंभीर आर्थिक, सामाजिक और मानवीय परिणाम होंगे। इससे महंगाई और जरूरी चीजों की लागत बढ़ेगी। इसका असर खाद्य पदार्थों और दवाओं पर भी पड़ सकता है।
पेरिस स्थित एफएटीएफ की बैठक अगले महीने होगी। पेरिस में होने वाली इस बैठक में एफएटीएफ के 39 स्थायी सदस्य भाग लेंगे। एक एशियाई राजनयिक ने निक्कई एशिया को बताया कि इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि इस बैठक में म्यांमार को काली सूची में डाल दिया जाए।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक म्यांमार की सैनिक सरकार ने पिछले हफ्ते मनी लॉन्ड्रिंग के मुद्दे पर बैठक की थी। गृह मंत्री सोए हतुत ने बैठक के बाद कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों को धन मुहैया कराने के खिलाफ म्यांमार सरकार अपनी प्रक्रिया तेज कर रही है। लेकिन अभी भी कुछ कमजोरियां हैं। विशेषज्ञों को चिंता इस बात की है कि म्यांमार को ब्लैक लिस्टेड करने का असर सिर्फ कंपनियों और दोषी संगठनों पर ही नहीं होगा। बल्कि उससे देश के आम निवासी प्रभावित होंगे। इसकी वजह से संभव है कि म्यांमार से शरणार्थियों का पलायन शुरू हो जाए। एक विश्लेषक ने कहा कि इस कदम के कारण बैंक खाता खोलना या चलाना या किसी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए वित्तीय सेवाओं का उपयोग अधिक कठिन हो जाएगा। बहुत से बैंक और वित्तीय संस्थान म्यांमार से संबंधित सेवाएं प्रदान करना बंद कर देंगे।
म्यांमार स्थित एक विदेशी कारोबारी ने कहा कि अगर एफएटीएफ म्यांमार को ब्लैक लिस्टेड करता है, तो उसका खराब अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्थाओं पर भी पड़ेगा। तब मुमकिन है कि वे म्यांमार में मानवीय सहायता के अपने काम को सीमित करने पर मजबूर हो जाएं। निक्कई एशिया के मुताबिक यहां एक ड्राफ्ट सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है, जिसके बारे में समझा जाता है कि उसे ब्रिटेन और यूरोप के उद्योगपति संगठनों ने तैयार किया है। उसमें कहा गया है कि ब्लैक लिस्टेड करने का म्यांमार पर विनाशकारी असर होगा। पिछले एक दशक में देश में आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की दिशा में जो प्रगति हुई है, उसे इस कदम से क्षति पहुंचेगी। इस बीच इस तरफ भी ध्यान खींचा गया है कि सैनिक शासन से देश को मुक्ति दिलाने के लिए बनाई गई वैकल्पिक नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) ने सैनिक शासन पर प्रतिबंध लगाने के लिए मुहिम चलाई है, लेकिन उसने म्यांमार को एफएटीएफ की काली सूची में डालने का समर्थन नहीं किया है।