राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने श्रीलंका और भारत के जमीन संपर्क को बेहद अहम करार दिया है। उन्होंने युद्धग्रस्त क्षेत्र के विकास पर चर्चा के लिए जाफना का दौरा किया। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने रविवार को कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पूर्वोत्तर मन्नार और दक्षिण भारत के बीच पुल बनाने के विचार पर चर्चा की है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया, जाफना बहुत महत्व रखता है। यह वही क्षेत्र है जहां लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम ने 30 वर्षों तक एक अलग तमिल मातृभूमि के लिए सैन्य अभियान चलाया था। बता दें कि 2009 में श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के सर्वोच्च नेता वी प्रभाकरण को मौत के घाट उतारा था।
विक्रमसिंघे ने कहा, दिवालिया हो चुकी श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को दोबारा मजबूत बनाने के लिए वह ऐसे फैसले लेने को भी तैयार हैं जो जनता की नजर में अलोकप्रिय हो सकते हैं। उन्होंने उत्तरी क्षेत्र जाफना की अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने के तरीकों पर काम करने का वादा भी किया।
उन्होंने कहा, उत्तरी प्रांत के गंभीर मुद्दों में भूमि विवाद के साथ-साथ लापता व्यक्तियों के मामलों को भी प्राथमिकता दी जा रही है। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के मुताबिक श्रीलंका की सरकार ने चिंताओं को दूर करने के लिए शीघ्र समाधान की योजना बनाई है। 2025 के अंत से पहले दोनों मुद्दों का समाधान कर लिया जाएगा।
विक्रमसिंघे ने आर्थिक विकास के लिए धार्मिक सद्भाव के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रीलंका सरकार, उत्तर में युद्ध के दौरान नष्ट हो चुकी अर्थव्यवस्था और राजस्व के क्षेत्र को नए सिरे से खड़ा करने के लिए विकास कार्यक्रम में तेजी लाने का इरादा रखती है।
अपनी चार दिवसीय जाफना यात्रा के दौरान, राष्ट्रपति ने श्रीलंकाई संविधान में 13वें संशोधन (13ए) के महत्व पर भी प्रकाश डाला। भारत भी इसका समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि 13ए के तहत कई प्रांतीय प्रशासन बनाए गए हैं। इसका आर्थिक विकास हासिल करने के लिए बेहतर उपयोग किया जाना चाहिए। इसमें केंद्र का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
खबरों के मुताबिक भारत 13ए को लागू करने के लिए श्रीलंका पर दबाव डाल रहा है। इसे 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के बाद लाया गया था। 13ए श्रीलंका में तमिल समुदाय को सत्ता के हस्तांतरण का प्रावधान करता है। जाफना श्रीलंका की इकोनॉमी के लिहाज से बेहद अहम है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2017 में बताया था कि 1980 के दशक के अंत से श्रीलंका में गायब हुए लोगों की संख्या 60,000 से एक लाख के बीच हो सकती है। इस क्षेत्र में आर्थिक विकास का अभाव है। हाल के वर्षों में श्रीलंकाई नेताओं ने कहा है कि वे देश के तमिल बहुल उत्तरी और पूर्वी प्रांतों के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं।