विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि इस्राइल में अनिवार्य सैनिक सेवा के प्रावधान के कारण बड़ी संख्या में नौजवान विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के पहले साइबर सुरक्षा ओर साइबर युद्ध के क्षेत्र में काम करने चले जाते हैं। तेल अवीव स्थिति एकेडमिक कॉलेज में साइबर सुरक्षा अध्ययन विभाग के प्रमुख ताल पावेल के मुताबिक सैन्य तकनीक में इस्राइल की बढ़त के पीछे अनिवार्य सैन्य सेवा के प्रावधान की बड़ी भूमिका है।
बताया जाता है कि इस्राइली सेना की एक खुफिया इकाई- यूनिट 8200 है, जिसकी हाईटेक उपकरण बनाने में बड़ी भूमिका है। साइबर जासूसी की तकनीक विकसित करने में भी उसकी अहम भूमिका मानी जाती है। पावेल ने सीएनएन से कहा- ‘इस्राइल में एक खास बात साइबर उद्योग और बाकी उद्योगों के बीच कायम हुआ तालमेल है।’ दूसरे विशेषज्ञों ने भी ध्यान दिलाया है कि इस्राइल में आम उद्योग, रक्षा उद्योग, खुफिया तंत्र और सरकार मिलजुल कर काम करते हैं। इसीलिए 2009 में स्थापित हुई कंपनी एनएसओ की जो जिम्मेदारी ताजा विवाद में मानी जा रही है, उससे सरकार बिल्कुल पल्ला नहीं झाड़ सकती।
लेकिन इस्राइली विशेषज्ञों का कहना है कि इस्राइल को जानबूझ कर निशाना बनाया जा रहा है। इस्राइल के कई बड़े नेताओं के लिए काम कर चुके रणनीति और संचार कंसल्टेंट इस्रेल बेकर ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘ईमानदारी की बात यह है कि सभी देश एक दूसरे खिलाफ लगातार खुफिया जानकारियां इकट्ठी करते हैं। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की जासूसी करता है। लेकिन जब बात इस्राइली कंपनियों की आती है, तो बड़ा पाखंड सामने आ जाता है।’
बेकर का इशारा अमेरिका में सात साल पहले हुए इस खुलासे की तरफ था, जिसमें बताया गया था कि वहां की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) दुनियाभर के नेताओं के साथ-साथ अपने नागरिकों की जासूसी भी करती है। बेकर जिन नेताओं को अपनी सेवाएं दे चुके हैं, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी हैं।