जानकारों के मुताबिक ताजा संकेतों से साफ है कि तालिबान का अमीरात की पुरानी व्यवस्था बहाल करने में यकीन बना हुआ है। इस व्यवस्था में धार्मिक नेता अमीर यानी सर्वोच्च शासक होता है। माना जाता है कि उसे शासन करने का अधिकार अल्लाह की तरफ से मिला हुआ है। इसलिए उसके आदेशों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। न ही उसका चुनाव लोकतांत्रिक ढंग से होता है।
पाकिस्तानी पत्रकार अहमद राशिद ने जर्मन मीडिया डॉयचे वेले से कहा- ‘क्या बदला है? कुछ भी नहीं। तालिबान का लोकतंत्र में भरोसा नहीं है। वह चाहता है कि अफगानिस्तान सरकार गिर जाए, ताकि वह देश पर कब्जा करके फिर से अपना सिस्टम लागू कर सके।’
टीकाकार शेर जान अहमदजई ने वेबसाइट एशिया टाइम्स में लिखी एक टिप्पणी में कहा है- ‘दशकों तक अफगानिस्तान का अध्ययन करने के दौरान मेरे सामने एक भी ऐसा विश्वसनीय साक्ष्य नहीं आया, जिससे लगे कि तालिबान ने किसी उस समझौते का पालन किया है, जिस पर उसने दस्तखत किए थे। ऐसी भी घटनाएं हुई हैं, जब बैठक के लिए बुलाए गए अपने विरोधियों की उसने हत्या तक कर दी। उसने वादा किया था कि लड़कियों की शिक्षा में वह बाधा नहीं डालेगा। लेकिन बाद में वह इससे मुकर गया।’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि पिछले साल तालिबान ने अमेरिका से हुए समझौते में वादा किया था कि लौटते अमेरिकी फौजियों पर वह हमला नहीं करेगा। अब तक उसने इस वादे का पालन किया है। लेकिन अफगानिस्तान सरकार के साथ चल रही उसकी वार्ता में युद्धविराम या सत्ता साझा करने के मसलों पर उसका कोई समझौता नहीं हुआ है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि तालिबान के पिछले शासन के समय अफगानिस्तान में आतंकवादियों को पनाह दी गई थी। उन आतंकवादियों ने अमेरिका सहित दुनिया में कई जगहों पर हमले किए। इन दहशतगर्दों में अल-कायदा और उसका मुखिया ओसामा बिन लादेन भी था। अब अंदेशा जताया जा रहा है कि तालिबान का फिर से काबुल पर कब्जा हुआ, तो अफगानिस्तान फिर से आतंकवादियों का अड्डा बन सकता है।