पाकिस्तानी मीडिया में दो मुद्दे लगातार छाए हैं। एक तो पाकिस्तान का सियासी संकट और दूसरा भारत से बातचीत टूटना। औसाफ ने पाकिस्तान में जारी संकट में बतौर मध्यस्थ सेना प्रमुख की भूमिका को देश के हित में बताया है।
अखबार कहता है कि जब इमरान खान और ताहिरुल कादरी सेना प्रमुख से मिल रहे थे तो कहीं नए चुनावों की अटकलें लगाई जा रही थीं तो कोई नई सरकार बनाए जाने के कयास लगा रहा था। लेकिन इनका सच से कोई वास्ता नहीं निकला।
अखबार के मुताबिक जब राजनेता संकट को हल करने में नाकाम हो गए तो सेना को आगे आना पड़ा है।
पेशावर से छपने वाले रोजनामा मशरिक का कहना है कि संकट को सुलझाने के लिए फ़ौज का दरवाजा खटखटाने से साफ़ है कि राजनेताओं को एक दूसरे पर तो भरोसा है ही नहीं बल्कि लोकतंत्र पर भी उनका विश्वास कम ही लगता है।