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इनको मंगलसूत्र नहीं शादी का प्रमाणपत्र चाहिए!

Thu, 19 Feb 2015 12:58 PM IST
अंबर शम्सी, बीबीसी / पाकिस्तान
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पाकिस्तान में हिंदू विवाह को कानूनी तौर पर कुबूला नहीं गया है, जिसकी वजह से निचले तबके के लोग प्रभावित होते हैं। पिछले साल सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद इस मुद्दे के समाधान के लिए एक विस्तृत विधेयक नेशनल असेंबली में लाए थे पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से दो बार विधेयक पारित करने के आदेश के बावजूद इसे कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिली।
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ताराचंद पाकिस्तानी हैदराबाद की एक हिंदू बस्ती में रहते हैं। वह बस्ती के दूसरे 40 परिवारों की तरह ही सब्जी और फल का ठेला लगाकर अपनी विधवा मां, पत्नी और सात बच्चों का पेट पालते हैं। ताराचंद की शादी 16 साल पहले हुई थी। उनकी पत्नी मीरा गले में मंगलसूत्र पहनती हैं और मांग में सिंदूर लगाती है। तारा का कहना है कि शादी के प्रमाणपत्र के बिना उनके रिश्ते का यही प्रमाण है।

नहीं कोई प्रमाणपत्र

उनका कहना है कि सरकार के हिसाब से हमारी शादी नहीं हुई। हमारी शादी तो हुई है पर अगर कोई मेरी पत्नी को उठा ले जाता है, या बच्चे का अपहरण हो जाता है तो मेरे पास दावे के लिए कोई प्रमाणपत्र नहीं है।

तारा अपनी पत्नी मीरा के लिए पति के नाम वाला पहचान पत्र बनवाने की कोशिश कर रहे हैं पर उनके पास शादी की कोई तस्वीर नहीं है। मीरा का कहना है, "हमें अब पता चला है कि पहचान पत्र से वतन कार्ड मिलता है और इसके तहत बेनज़ीर इन्कम सपोर्ट प्रोग्राम से पैसे भी मिलते हैं। '

'कहते हैं निकाहनामा दिखाएं'

पाकिस्तान में हिंदू शादियों के लिए कोई विशेष कानूनी दस्तावेज मौजूद नहीं है। हैदराबाद में पारिवारिक मामलों के एडवोकेट शावक राठौड़ ने बताया कि उनकी बिरादरी कई साल से हिंदू विवाह के पंजीकरण की मांग कर रही है और यह समस्या कम्प्यूटरीकृत पहचान पत्र और इसका महत्व बढ़ने के बाद अधिक शुरू हुआ है।

ताराचंद ने कहा, "जब हम पहचान पत्र बनवाने जाते हैं तो वे कहते हैं निकाहनामा दिखाएं। फिर हम जब उन्हें बताते हैं कि हमारे यहां निकाहनामा नहीं, फेरे लिए जाते हैं तो वे कहते हैं कि हमें इससे कोई लेना-देना नहीं। अपने रीति-रिवाज अपनी जगह हमें तो प्रमाणपत्र चाहिए।" उन्होंने बताया कि जब किसी अदालत में घरेलू मामले जाते हैं जैसे कि जबरन शादियां, संपत्ति या तलाक के मामले तो उन्हें निपटाने में बहुत मुश्किल होती है।

ये है व्यवस्था

अगर कोई महिला तलाक लेना चाहे तो न्यायाधीश हमसे पूछते हैं कि अगर कोई दस्तावेज मौजूद नहीं तो तलाक कैसे दिया जा सकता है? हिंदू पंडितों या पंचायतों के पास शादी-ब्याह के दस्तावेजीकरण का अधिकार नहीं है।

पाकिस्तान में हिंदू जोड़े अपने रीति-रिवाज के अनुसार शादी तो कर लेते हैं पर राज्य उसे स्वीकार नहीं करता। पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के सदस्य डॉक्टर रमेश कुमार वानकोनिय ने पिछले साल हिंदू मैरिज एक्ट को एक निजी सदस्य के रूप में संसद में पेश किया। डॉक्टर रमेश कहते हैं कि जैसे निकाह को सरकार की मान्यता मिली हुई है वैसे ही हिंदुओं के लिए भी होनी चाहिए।

हिंदू मैरिज एक्ट पर उनका कहना है, "इस कानून में शादी और तलाक का पूरा मसौदा है। मसलन कि पंडित या महाराज कैसा है? कितने फेरे होने चाहिए? क्या वह हमारे धर्म के हिसाब से शादी करवा रहे हैं? क्या ज‌िला परिषद में पंजीकरण हुआ है या नहीं। हम भी इस देश के नागरिक हैं, हमें भी राज्य की ओर से ऐसी व्यवस्था चाहिए।" डॉक्टर रमेश का कहना है कि यह विधेयक संसदीय समिति और मंत्रिमंडल के पास है।
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अधूरी पहचान

इस विधेयक के अनुमोदन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दो बार आदेश दिए हैं पर कोई प्रगति नहीं हुई। उनका कहना है, "मैंने यह प्रस्तावित विधेयक चारों प्रांतों को भी भेजा है और यह कैबिनेट के पास पिछले साल सितंबर से है। सुप्रीम कोर्ट ने तो उसे पारित करने के आदेश जारी किए हैं लेकिन किसी को भी इस विधेयक में रुचि नहीं है। मेरी गुजारिश है कि अगर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और कैबिनेट के पास समय नहीं तो नेशनल असेंबली को इस विधेयक को मंज़ूरी दे देनी चाहिए।

"पाकिस्तान में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है जिनमें से सबसे अधिक संख्या निचली जाति के हिंदुओं की है। उनके पास न सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने के पैसे हैं और न काम करने के लिए संबंध हैं। यह एक बड़ा मसला है क्योंकि इस क़ानून के अभाव में हिंदू अल्पसंख्यकों की पहचान अस्पष्ट रहेगी।
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