पाकिस्तान के सबसे बड़े जातीय अल्पसंख्यकों में से एक के खिलाफ हालिया कार्रवाई में पाकिस्तानी सेना ने अपने आर्मी पब्लिक स्कूलों में पश्तो पर प्रतिबंध लगा दिया है। स्थानीय मीडिया ने यह जानकारी दी है। अब खैबर पख्तूनख्वा के कई स्कूलों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है, छात्रों को चेतावनी दी गई है कि अगर इस भाषा में बोलते हुए पकड़े गए तो उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस कदम की निंदा की और कहा कि प्रतिबंध को उजागर किया जाना चाहिए और इसे रोका जाना चाहिए।
कई स्कूलों में पश्तो बोलने की मनाही
पश्तून तहफुज आंदोलन के प्रमुख मंजूर पश्तीन ने एक बयान में इस कार्रवाई के जवाब में कहा, पश्तो को लंबे समय से मीडिया, पाठ्यक्रम, न्याय और राजनीति से हटा दिया गया है, लेकिन कई स्कूलों में भी पश्तो बोलने की मनाही है। हमें कई भाषाएं सीखनी चाहिए, लेकिन कोई भी हमारी मातृभाषा पश्तो पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। पश्तीन ने आगे कहा कि अगर किसी भी तरह से भाषा खो जाती है तो लोगों की राष्ट्रीय पहचान खत्म हो जाएगी।
इससे पहले भी खैबर पख्तूनख्वा के बुद्धिजीवियों ने पाकिस्तान सरकार से स्कूलों में पश्तो को शिक्षा का माध्यम घोषित करने का आग्रह किया था, हालांकि भाषा पर हालिया कार्रवाई ने पूरे देश में भारी आक्रोश फैला दिया। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, पेशावर के अलावा स्वात, मलकंद, बुनेर, स्वाबी, मर्दन, नौशेरा, चारसद्दा, डेरा इस्माइल खान, बन्नू, करक और अन्य आदिवासी जिलों में साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों ने मातृभाषा के महत्व को बताने वाले कार्यक्रम बार-बार आयोजित किए हैं।