पर्यवेक्षकों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के समय जब अमेरिका ने बातचीत शुरू की, तो उसने तालिबान के सामने ये शर्त रखी थी कि वह अफगानिस्तान की जमीन पर अल-कायदा और दूसरे गुटों को सक्रिय नहीं होने देगा। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को शक है कि तालिबान में आईएसआईएस-के से निपटने की इच्छाशक्ति या क्षमता है। अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि अतीत में तालिबान ने आईएसआईएस-के और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की है। लेकिन नए दौर में उसका क्या रुख रहेगा, इस बारे में अभी कोई स्पष्टता नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हक्कानी नेटवर्क के संबंध आईएसआईएस-के और तालिबान दोनों के साथ हैं। उसमें कहा गया था कि हक्कानी नेटवर्क की कोई अपनी विचारधारा नहीं है, इसलिए वह साथ-साथ विरोधी संगठनों के साथ संपर्क बनाए रखता है। लेकिन आईएसआईएस-के से जुड़े दहशतगर्द विचारधारा के मामले में कट्टरपंथी हैं। आतंकवादी कार्रवाइयों के मामले में वे प्रशिक्षित और तकनीकी क्षमता से लैस हैं।
सिंगापुर स्थित एस राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में आतंकवाद विशेषज्ञ राफेलो पैंतुची ने ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स से कहा है कि अब तालिबान के सत्ता में आने का लाभ उठा कर आईएसआईएस-के अपनी पहचान ऊंची करने की कोशिश करेगा। ऐसा करने से उसे अधिक चंदा और नए कार्यकर्ता मिलेंगे। उन्होंने कहा- ‘आतंकवाद हमेशा ही व्यवस्था विरोधी होता है और अब अफगानिस्तान में तालिबान व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए आईएसआईएस-के के उदय और प्रसार के लिए स्थितियां अनुकूल हैं। और संभवतया अब ऐसा ही होने की संभावना है।’