पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए चीन के साथ अपने देश के रिश्तों पर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के हालिया हमलों के कारण पड़े साये को दूर करना आसान नहीं है। ये बात पाकिस्तान के सुरक्षा विशेषज्ञ भी मान रहे हैं। अपनी इस महीने हुई चीन यात्रा के दौरान इमरान खान का काफी समय चीनी नेताओं को यह भरोसा दिलाने में बीता कि उनकी सरकार बीएलए और दूसरे आतंकवादी संगठनों का मुकाबला करने में सक्षम है।
हाल के समय में बीएलए एक घातक उग्रवादी गुट के रूप में सामने आया है। उसने बीते 25 जनवरी को ग्वादार बंदरगाह के निकट केच जिले में हमला किया था। उसमें अर्धसैनिक बल के दस जवान मारे गए थे और तीन घायल हो गए थे। इन हमलों ने बलूचिस्तान में भय का माहौल बना रखा है। जबकि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण परियोजनाएं इसी प्रांत में चल रही हैं।
इमरान खान ने बलूचिस्तान के निशकी जिले का दौरा किया है, जहां दो फरवरी को हमला हुआ था। वहां उन्होंने कहा- ‘मेरी सरकार आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देगी। वे बलूचिस्तान में जारी शांति प्रक्रिया में बाधा डालने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं।’
सुरक्षा विशेषज्ञों ने संदेह जताया है कि बीएलए को आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से मदद मिल रही है। हालिया हमलों से पाकिस्तान की ये उम्मीद गलत साबित हो गई है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने से बलूचिस्तान में विद्रोह थम जाएगा। सिंगापुर स्थित एस राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में सीनियर फेलॉ एम डोरसी ने कहा है- ‘वह सोच एक भ्रम ही साबित हुई। यह संभव है कि विदेशी ताकतें बलूच विद्रोह से बनी स्थिति का फायदा उठा रहे हों। लेकिन यह सच नहीं है कि विदेशी ताकतों की वजह से वहां विद्रोह पैदा हुआ है।’
कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने बीएलए को ईरान की मदद मिलने का भी संदेह जताया है। लेकिन ज्यादातर विशेषज्ञों की राय है कि बीएलए को दूसरे आतंकवादी गुटों का साथ मिल रहा है, जिनका किसी देश की सरकार से कोई रिश्ता नहीं है।