बताया जाता है कि निवेशकों को पहले ही नेटफ्लिक्स की ऐसी रिपोर्ट आने का अहसास हो गया था। नतीजतन, बीते शुक्रवार को अमेरिका में नेटफ्लिक्स के शेयरों के भाव में 22 फीसदी की गिरावट आई। जानकारों के मुताबिक जब स्क्विड गेम्स का प्रदर्शन शुरू हुआ, तब इस कंपनी के भविष्य को लेकर ऊंची उम्मीदें जगी थीं। लेकिन बीते नवंबर के बाद शेयर बाजार में कंपनी को लेकर उत्साह धीमा पड़ने लगा। नवंबर की तुलना में अब तक नेटफ्लिक्स के शेयरों के भाव में 40 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है।
स्क्विड गेम्स भी हुआ फेल
नेटफ्लिक्स की नए सब्सक्राइबर्स को आकर्षित करने की क्षमता में आई गिरावट के बाद अब कंपनी के बिजनेस मॉडल पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इऩ्वेस्टमेंट बैंक नीधम एंड कंपनी से जुड़ी विश्लेषक लाउरा मार्टिन ने ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘चौथी तिमाही शुरू होने से एक हफ्ता पहले स्क्विड गेम्स का प्रसारण शुरू हुआ। लेकिन नेटफ्लिक्स का ये सबसे बड़ा हिट शो भी पर्याप्त संख्या में सब्सक्राइबर्स को आकर्षित नहीं कर पाया। साफ है कि अब प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ कंटेंट की ताकत काफी नहीं रह गई है। इसका कारण शायद यह है कि अब परंपरागत मीडिया समूह भी अपनी स्ट्रीमिंग सेवाएं शुरू करने में काफी निवेश कर रहे हैं।’
जानकारों के मुताबिक अब ऐसा लगता है कि निवेशक स्ट्रीमिंग बिजनेस की ऊंची लागत को लेकर संवेदनशील हो रहे हैं। वे इस बात को लेकर सचेत हो गए हैं कि स्ट्रीमिंग कंटेंट की जीवनकाल भी ज्यादा लंबा नहीं होता। यानी कुछ ही समय बाद इन प्रोग्रामों को देखने वाला कोई नहीं रहता। नेटफ्लिक्स की रिपोर्ट जारी होने के बाद मार्केट रिसर्च कंपनी मोफेटनैथसन से जुड़े विश्लेषकों ने कहा स्ट्रीमिंग कंटेंट की क्षय गति (डिके रेट) अत्यधिक तीव्र है। ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि लोकप्रिय कार्यक्रमों को लोग एक ही रात में देख डालते हैं। उसका मतलब यह होता है कि स्ट्रीमिंग कंपनियों को नए सब्सक्राइबर पाने के लिए लगातार नए कंटेंट पर खर्च करते रहना पड़ता है।
बहुराष्ट्रीय इन्वेस्टमेंट बैंक मॉर्गन स्टैनले के एक अनुमान के मुताबिक नेटफ्लिक्स इस वर्ष कन्टेंट तैयार करने पर 18 अरब डॉलर खर्च करेगी। दूसरी स्ट्रीमिंग कंपनियां भी भारी खर्च कर रही हैँ। फाइनेंशियल टाइम्स का अनुमान है कि स्ट्रीमिंग होड़ में शामिल अमेरिकी मीडिया कंपनियां इस वर्ष 140 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च करेंगी। इसके बीच असल सवाल है कि क्या ये कंपनियां उतने सब्सक्राबर जुटा पाएंगी, जिससे वे अपनी इस लागत को निकाल पाएं?