स्कॉटलैंड के ग्लासगो में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में वार्ताकार कोयले के सभी प्रकार के इस्तेमाल को खत्म करने और जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को पूरी तरह से समाप्त करने के आह्वान से पीछे हटते दिखाई दिए। हालांकि दो सप्ताह चली इस वार्ता में गरीब देशों को ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए और वित्तीय अधिक मदद दिए जाने की उम्मीद जगी है।
दो सप्ताह चली वार्ता में गरीब देशों को और अधिक वित्तीय मदद की उम्मीद जगी
शुक्रवार को जारी नवीनतम मसौदा प्रस्ताव में देशों से ‘कोयले से पैदा होने वाली बिजली और जीवाश्म ईंधन के लिए सब्सिडी को चरणबद्ध ढंग से बंद करने’ की प्रक्रिया में तेजी लाने की अपील की गई है। यदि इस पर सहमति हो जाती है, तो इससे कोयले के इस्तेमाल और जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी देने का मौका मिल सकता है।
एक ओर इस प्रस्ताव पर वार्ता के अंतिम दिन और चर्चा होने की संभावना है, तो दूसरी ओर इसकी भाषा में बदलाव ने इन शर्तों में फेरबदल के संकेत दिए गए हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन के निरंतर उपयोग से निपटना वार्ता में प्रमुख बिंदुओं में शामिल रहा। वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए इनका इस्तेमाल जल्द बंद करना जरूरी है।
राजनीतिक रूप से संवेदनशील
कोयले के इस्तेमाल को खत्म करना तथा जीवाश्म ईंधन सब्सिसडी को पूरी तरह समाप्त करने के आह्वान को व्यापक रूप से घोषणा में शामिल करना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। इसमें सऊदी अरब जैसे देश भी शामिल हैं, जिन्हें आशंका है कि तेल और गैस को अगला निशाना बनाया जा सकता है। दूसरी तरफ गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्तीय मदद को लेकर विकसित देश 2020 तक के लक्ष्य में नाकाम रहे हैं। इसके चलते विकासशील देश भी नाराज हैं।
महत्वाकांक्षा पर खरा नहीं उतरा सीओपी-26
ग्लासगो जलवायु शिखर सम्मेलन को एक सफलता के रूप में आंकने के लिए, इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह होना चाहिए था कि संबंधित पक्ष इस बात पर सहमत हों कि दुनिया के अधिकांश जीवाश्म ईंधन भंडार को जमीन के भीतर ही छोड़ दिया जाए। ऑस्ट्रेलिया में यूएनएसडब्ल्यू के विशेषज्ञ जेरेमी मॉस ने कहा कि सीओपी-26, उस महत्वाकांक्षा पर खरा नहीं उतरा है क्योंकि इसमें ऐसी बहुत सी खामियां हैं, जीवाश्म ईंधन उद्योग जिनका फायदा उठा सकता है।