रिपोर्ट बताती है कि एक ही प्रकार के भोजन की बर्बादी का स्तर विश्व में क्षेत्रों के हिसाब से बदल जाता है और जहां बर्बादी की मात्रा ज्यादा है, वहां उचित उपायों के जरिए उसे रोका जा सकता है।
अनाज और दलहन की तुलना में सप्लाई चेन में फलों और सब्जियों का नुकसान और बर्बादी आम तौर पर ज्यादा होती है। औद्योगिक देशों की तुलना में निम्न आय वाले देशों में ताजा फलों और सब्जियों का नुकसान होने का मुख्य कारण वहां बदहाल बुनियादी ढांचे को बताया गया है।
ऐसे कई देशों में भंडारण के समय बड़ी मात्रा में भोजन का नुकसान होता है, क्योंकि वहां ठंडा वातावरण प्रदान करने वाले गोदामों सहित भंडारण की अन्य पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
अधिकांश उच्च-आय वाले देशों में भंडारण की पर्याप्त सुविधा होने के बावजूद नुकसान होता है, क्योंकि कई बार सही तापमान का ख़याल नहीं रखा जाता, गोदामों में तकनीकी खराबी पेश आती है या फिर जरूरत से ज्यादा मात्रा में भोजन रखा जाता है।
जिन चरणों पर भोजन की बर्बादी का पैमाना सबसे अधिक है वे खाद्य सुरक्षा पर सबसे अधिक असर पड़ने के कारण हैं जिसके आर्थिक नतीजे भी होते हैं। यह खुदरा और उपभोक्ता के स्तर पर पर होने वाली भोजन की बर्बादी को कम करने की अहमियत को भी दर्शाता है।
रिपोर्ट में देशों से अनुरोध किया गया है कि सभी चरणों में भोजन के नुक़सान और उसकी बर्बादी के मूल कारणों की रोकथाम के लिए प्रयास तेज़ किए जाने चाहिए। इसके लिए जरूरी नीतियों के लिए सुझाव भी प्रदान किए गए हैं। इस नुक़सान और बर्बादी को रोकने में काफी लागत आती है।
यही वजह है कि किसान, आपूर्तिकर्ता और उपभोक्ता बर्बादी को रोकने के लिए तभी क़दम उठाएंगे जब उससे होने वाला फ़ायदा इन प्रयासों की कीमत से ज्यादा हो। सप्लाई चेन में शामिल सभी हिस्सेदारों को प्रोत्साहन देने के लिए ऐसे विकल्पों की पहचान करनी होगी जिसे अपनाने से उन्हें होने वाले नेट फायदे में वृद्धि हो या मौजूदा फायदों के बारे में जानकारी मुहैया कराई जाए।
भोजन की बर्बादी को रोकने के प्रयासों में खर्च के अलावा भी अक्सर कई अन्य अवरोधों का सामना करना पड़ता है। विकासशील देशों में ऐसे उपाय लागू करने में बड़ी लागत आती है जो निजी क्षेत्र और छोटे व मझोले किसानों के लिए मुश्किल का सबब बनती है।
इस समस्या पर पार पाने के लिए कर्ज की आसान उपलब्धता को अहम समझा गया है। रिपोर्ट में भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए अपनाई जाने वाली नीतियों को स्पष्ट और सुसंगत बनाने के साथ-साथ उनके मूल्यांकन और समीक्षा की अहमियत रेखांकित की गई है ताकि जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।