विशेषज्ञों के मुताबिक आरंभिक रूप से जीरो कोविड रणनीति सफल रही, हालांकि इसकी कीमत भी इसे अपनाने वाले देशों को चुकानी पड़ी है। पर्यटन पर निर्भर न्यूजीलैंड और प्रशांत महासागर में मौजूद द्वीपीय देशों की अर्थव्यवस्था को इस रणनीति से भारी नुकसान हुआ है। ऑस्ट्रेलिया के लोगों के लिए पिछले डेढ़ साल से विदेश जाना या विदेश जाने पर देश लौटना बेहद मुश्किल बना हुआ है।
इस रणनीति का फायदा यह हुआ है कि चीन या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में कभी महामारी ने वैसा भयानक रूप नहीं लिया, जैसा यूरोप या अमेरिका में इसने लिया था। ग्रेपिन ने कहा- ‘मोटे तौर पर गुजरे डेढ़ साल में एशिया-प्रशांत क्षेत्र कोविड का मुकाबला करने में अपेक्षाकृत कामयाब रहे हैं। इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने जो रणनीति अपनाई वह सही नहीं थी।’
लेकिन अब कहानी बदल गई है। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डेल फिशर के मुताबिक चीन और ऑस्ट्रेलिया ने सीमा को सख्ती से बंद रखने का तरीका अपनाया। साथ ही जहां संक्रमण के संकेत दिखे, वहां सबकी जांच की गई। लेकिन इस तरीके को डेल्टा वैरिएंट से कड़ी चुनौती मिली है। ये वैरिएंट उतना ही संक्रामक है, जितना चेचक का वायरस होता है। यह चीन के वुहान में 2019 में सामने आए वायरस की तुलना में 60 से 200 फीसदी तक ज्यादा संक्रामक है।
ऑस्ट्रेलिया सरकार की अब यह कह कर आलोचना हो रही है कि उसने टीकाकरण पर पूरा ध्यान नहीं दिया। अब तक वहां की ढाई करोड़ आबादी में से सिर्फ 17 फीसदी का टीकाकरण हुआ है। सिडनी यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ की प्रोफेसर एलेक्जांड्रा मार्तिनिउक ने सीएनएन से कहा- ‘यह बहुत बड़ी गलती हुई। हम अपने नजरिए पर अड़े रहे, जिस वजह से बहुत कम लोगों का टीकाकरण हुआ। उसके बाद ये खतरनाक वैरिएंट आ गया।’