तोक्यो ओलंपिक की शुरुआत से पहले जापान एक व्यापक आत्म-निरीक्षण के दौर से गुजर रहा है। इस दौरान मीडिया में हो रही चर्चाओं में इस ओर ध्यान खींचा गया है कि इस ओलंपिक ने कई क्षेत्रों में जापान की हैसियत में आई गिरावट पर रोशनी डाली है। एक ऐसे विश्लेषण में बताया गया कि जब 1964 में जापान ने पहली बार ओलंपिक खेलों की मेजबानी की थी, तो उसके 15 साल के अंदर जापानी कंपनियों ने अपने कई आविष्कार दुनिया के सामने पेश किए। मसलन, सोनी कॉर्प ने वीसीआर, तोशीबा कॉर्प ने फ्लैश मैमोरी, और स्पेस इनवेडर्स ने आर्केड शूट-एम अप जैसे गेम के जरिए गेमिंग की दुनिया में क्रांति ला दी। तब जापान दुनिया में तकनीकी श्रेष्ठता का दूसरा नाम बन गया था। ये चर्चा तेज हो गई थी कि जापान जल्द ही अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
यहां के अखबार जापान टाइम्स ने लिखा है- ‘वे बातें अब युगों पुरानी लगती हैं। अब जबकि तोक्यो ओलंपिक की मेजबानी कर रहा है, तो जापान तकनीकी पिछड़ेपन की स्थिति में है। टेलीविजन, रिकॉर्डिंग उपकरण, और कंप्यूटर के क्षेत्र में दुनिया भर में सबसे आगे रहने की कहानी पीछे छूट चुकी है।’ इस रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि जापान वॉकमैन के आविष्कार का श्रेय ले सकता है, लेकिन आई-फोन एक अमेरिकी कंपनी ने पेश किया। उससे भी ज्यादा अपमान की बात यह है कि पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स ने स्मार्टफोन और मैमोरी चिप के क्षेत्र में जापान को पीछे छोड़ दिया है। अब जो हालात हैं, उसके बीच अमेरिका और चीन टेक्नोलॉजी और डाटा के प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं। आशंका है कि जापान इस होड़ में बहुत पीछे छूट जाएगा।
पर्यवेक्षकों ने कहा है कि इन घटनाक्रमों से जापान का राष्ट्रीय आत्म-गौरव आहत हुआ है। उसके ऊपर ये अहसास है कि देश के कोरोना महामारी ठीक से न संभाल पाने का असर ओलंपिक खेलों पर पड़ा है। इन खेलों को बिना दर्शकों की मौजूदगी के कराना पड़ रहा है। इससे देश को प्राप्त होने वाले राजस्व से वंचित होना पड़ा है, जिससे अर्थव्यवस्था और तकनीकी आविष्कार को बल मिलने की उम्मीद जोड़ी गई थी।
कई विशेषज्ञों के मुताबिक जापान के पिछड़ने की वजह उसका आत्म-केंद्रित नजरिया है। जापान के आर्थिक, उद्योग और व्यापार मंत्रालय के आर्ईटी प्रभाग के निदेशक काजुमी निशिकावा ने जापान टाइम्स से कहा- देश को लालफीताशाही खत्म करनी होगी और विदेशी प्रतिभाएं लानी होंगी। उसे जापान केंद्रित नजरिए के प्रति अपनी जिद छोड़नी होगी। निशिकावा ने कहा- ‘मेड इन जापान यानी आत्म-निर्भरता का नजरिया कामयाब नहीं हुआ। अब हम इससे बचाना चाहते हैं।’
सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के टैक्स संबंधी विभाग के प्रमुख अकीरा अमारी ने कहा है कि कुछ देश अपने उद्योगों को अलग-अलग मात्रा में सहायता मुहैया करा रहे हैं। इस कारण उनसे प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो गया है। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि जापान ने अब इस दिशा में पहल की है। उसने सैकड़ों अरब येन का निवेश चिप इंडस्ट्री में करने का फैसला किया है। लेकिन ये निवेश अमेरिका की तुलना में कुछ भी नहीं है। बल्कि दक्षिण कोरिया में सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसी कंपनियां बीते एक दशक में जितना निवेश कर चुकी हैं, उसकी तुलना में भी जापानी निवेश कुछ नहीं है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक जापानी संसद के निचले सदन की विज्ञान और तकनीक समिति ने पिछले दिनों एक प्रजेंटेशन में जापान की नाकामियों का उल्लेख किया था। उसमें बताया गया कि जापान मेनफ्रेम कंप्यूटर के दौर में अग्रणी बना था। लेकिन पर्सनल कंप्यूटर का दौर आने पर वह उसके मुताबिक खुद को नहीं बदल सका। इस कारण सैमसंग जैसी कंपनियां आगे निकल गईं। अब जापान के लिए उस खाई को भर पाना कठिन हो गया है।