अफगानिस्तान पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के हमले की असल कीमत क्या रही, अब जानकार इसका अंदाजा लगाने में जुटे हैं। उनका कहना है कि मानवीय त्रासदी के रूप में इसकी जो कीमत चुकानी पड़ी है, उसका तो कोई आकलन नहीं हो सकता। ये कीमत अफगानिस्तान के लोगों, एनजीओ कर्मियों, पत्रकारों, सैनिकों और उनके परिजनों को चुकानी पड़ी है। 20 साल तक चले युद्ध की वजह से अफगानिस्तान में गरीबी, भुखमरी, विकलांगता, और मानसिक रोगों का जो परोक्ष परिणाम हुआ, उसकी कीमत का आकलन भी नामुमकिन है।
जिन देशों के सैनिक अफगानिस्तान में तैनात थे, उनमें सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिकी फौजियों और कॉन्ट्रैक्टरों को हुआ। यूरोपीय सैनिकों की तुलना में उनकी जान ज्यादा गई। इस लड़ाई के कारण जो हालात बने, उसके बारे में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त मिशेल बैशलेट ने हाल में कहा था कि अफगानिस्तान दुनिया का सबसे घातक स्थान बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक इस लड़ाई के दौरान साल 2009 के बाद से 50 हजार से ज्यादा अफगान नागरिक हताहत हुए। उसके पहले जो अफगान नागरिक निशाना बने, उसका सही अनुमान मौजूद नहीं है।
अफगानिस्तान में जारी खतरनाक हालात के कारण बड़ी संख्या में अफगान नागरिक विस्थापित होने को मजबूर हुए। वे या तो देश के अंदर ही किसी सुरक्षित जगह पर चले गए या फिर किसी दूसरे देश जा कर पनाह ली। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 30 लाख से ज्यादा लोग देश के अंदर विस्थापित हुए। उनमें पांच लाख तो इसी साल विस्थापित हुए हैं। उनके अलावा साल 2020 में 26 लाख अफगान दुनिया के दूसरे देशों में शरणार्थी बने हुए थे।
वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिका और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के हमले के बाद से जान-माल का लगभग 30 देशों को नुकसान हुआ है। पश्चिमी देशों ने अपने सैनिक भेजने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर अपना धन भी अफगानिस्तान में खर्च किया। उनका दावा था कि तालिबान और अल-कायदा जैसे आतंकवादी गुटों को परास्त करने के बाद वे अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अफगानिस्तान की अपनी सेना तैयार की, जिसके बारे में कहा गया है कि उसमें तीन लाख अधिकारी और जवान थे।
एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका ने अफगान युद्ध पर 2.6 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए। इसमें वह रकम शामिल नहीं है, जो युद्ध पर खर्च करने के लिए जो कर्ज लिया गया, उसका ब्याज चुकाने पर खर्च हुआ। यूरोपीय देशों ने कुल कितनी रकम खर्च की, इसका ब्योरा सार्वजनिक दायरे में मौजूद नहीं है। लेकिन ब्रिटेन के बारे में बताया गया है कि उसने 21 अरब पाउंड 2001 से 2014 के बीच खर्च किए थे।
काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अब पूरी पश्चिमी दुनिया में यही पूछा जा रहा है कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी और वित्तीय बोझ उठाने के बाद आखिर हासिल क्या हुआ? जिस तालिबान से अफगानिस्तान को मुक्ति दिलाने के लिए ये सारी कीमत चुकाई गई, वह फिर से काबुल पर काबिज हो गया है।