आमिर-अब्दुल्लाहियान इसके पहले बहरीन में ईरान के राजदूत रह चुके हैं। इसके अलावा 2011 से 2016 तक देश के अरब और अफ्रीकी मामलों के विदेश मंत्री भी थे। इससे साफ है कि वे कट्टरपंथी माने जाने वाले राष्ट्रपति महमूद अहमदीनिजाद और उदारवादी माने जाने वाले राष्ट्रपति हसन रूहानी दोनों के कार्यकाल में महत्वपूर्ण पद पर बने रहे। 2016 में जब तत्कालीन विदेश मंत्री जावाद जरीफ अमेरिका के ओबामा प्रशासन के साथ परमाणु डील की वार्ता में शामिल थे, तभी आमिर-अब्दुल्लाहियान को बर्खास्त कर दिया गया। बताया जाता है कि परमाणु मसले पर मतभेद के कारण आमिर-अब्दुल्लाहियान हटाए गए। इस बर्खास्तगी की तब देश के कट्टरपंथी नेताओं ने कड़ी आलोचना की थी।
ईरान में आमिर-अब्दुल्लाहियान को ‘क्रांतिकारी राजनयिक’ कहा जाता है। वे इराक, लेबनान, सीरिया और यमन में ईरान के हितों को आगे बढ़ाने के समर्थक रहे हैं। साथ ही वे फिलस्तीनी आंदोलन के जोरदार समर्थक हैं। वे सऊदी अरब के विरोधी हैं। ईरानी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक 2016 में उनकी बर्खास्तगी की एक वजह यह भी थी कि वे सऊदी अरब से संबंध सुधारने की राष्ट्रपति रूहानी की कोशिशों का विरोध कर रहे थे। आमिर-अब्दुल्लाहियान 57 साल के हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध विषय पर उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ले रखी है।
विश्लेषकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति का मतलब यह समझा जाएगा कि राष्ट्रपति रईसी परमाणु वार्ता में नरमी दिखाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडंन भी इस मामले में घरेलू दबाव के कारण सख्त रुख अपनाए हुए हैं। ऐसे में आमिर-अब्दुल्लाहियान की नियुक्ति को इस डील के पुनर्जीवित होने की संभावना पर एक आघात समझा जाएगा।