ईरान परमाणु करार से जुड़े पक्षों ने इसमें फिर से जान फूंकने की अपनी कोशिश को और आगे बढ़ाया है। सोमवार को करार से जुड़े देशों के विदेश मंत्रियों की वर्चुअल बैठक में इस तैयारी को ठोस रूप दिया गया। लेकिन अब सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन इस बारे में अपना वादा कब तक पूरा करते हैं।
बाइडेन ने कहा है कि 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद संभालने के बाद वे अपने देश को करार में वापस लाने की कोशिश करेंगे। इस समझौते पर 2015 में दस्तखत हुए थे। तब बाइडन अमेरिका के उप-राष्ट्रपति थे।
ईरान परमाणु करार पर एक तरफ से ईरान और दूसरी तरफ से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच सदस्य देश और जर्मनी शामिल हुए थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देश अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं। इसीलिए इस समझौते को ईरान और फाइव प्लस वन का समझौता भी कहा जाता था। डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद 2018 में अमेरिका को इस समझौते से निकाल लिया। बाद में ईरान ने भी समझौते में किए गए अपने वादों से हटना शुरू कर दिया।
सोमवार की बैठक के बाद एक साझा बयान में विदेश मंत्रियों ने कहा कि वे करार में अमेरिका की वापसी के लिए वे सकारात्मक रवैये के साथ तैयार हैं। यूरोपीय देश 2018 से ही समझौते को जीवित रखने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने समझौते से हटने के बाद ईरान पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए थे। ई-3 नाम से चर्चित फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने इन शर्तों को ना मानने का एलान किया था। अब उन्हें उम्मीद है कि बाइडन प्रशासन प्रतिबंधों को हटा लेगा।
प्रतिबंध लगने के बाद ईरान ने यूरेनियम का उस सीमा से ज्यादा संवर्धन शुरू कर दिया, जिसकी समझौते के तहत उसे इजाजत थी। अब ईरान का कहना है कि अगर अमेरिका और ई-3 समझौते में किए गए अपने वादों को निभाना शुरू कर दें, तो वह समझौते की शर्तों का पालन फिर शुरू कर देगा।
सोमवार की बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने जोर दिया कि अमेरिका को जल्द से जल्द और बिना किसी शर्त के समझौते में वापस आना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईरान अगर समझौते की शर्तों से हटा, तो उसका मुख्य कारण अमेरिका का पहले इससे हटना और ईरान पर अत्यधिक दबाव डालना था। उन्होंने कहा कि निर्वाचित राष्ट्रपति बाइडन ने अमेरिका को फिर से समझौते में शामिल करने का वादा किया है, इसलिए ईरान से संबिधित परमाणु स्थिति एक निर्णायक मोड़ पर आ गई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को बिना शर्त ईरान, उससे संबंधित तीसरे पक्षों, और व्यक्तियों पर से प्रतिबंध हटा लेने चाहिए। उसके बाद ईरान को पूरी तरह से समझौते की शर्तों का पालन करते हुए दोबारा इसका हिस्सा बन जाना चाहिए।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि ईरान में परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजाद की हत्या के बाद पैदा हुआ गुस्सा अभी भी जारी है। ईरान की राय है कि ये हत्या इस्राइल ने कराई। इस हत्या के बाद ईरान की संसद में कट्टरपंथी सदस्यों ने एक बिल पेश किया है। बिल में ईरान सरकार और देश की परमाणु ऊर्जा एजेंसी से यूरेनियम का संवर्धन तेज करने को कहा गया है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को देश से बाहर निकालने की मांग भी की गई है। लेकिन राष्ट्रपति हसन रूहानी की सरकार ने इस बिल का समर्थन नहीं किया है। सोमवार की बैठक के सिलसिले में ये ध्यान दिलाया गया कि यह ईरान सरकार की परमाणु करार में शामिल होने की इच्छा का संकेत है।
विश्लेषकों का कहना है कि ताजा कोशिशें सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही हैं। लेकिन अब सब कुछ बाइडेन प्रशासन की इच्छाशक्ति और अमेरिकी संसद से समझौते का अनुमोदन कराने की उसकी ताकत पर निर्भर करता है। अगर उसने सही माद्दा दिखाया, तो पश्चिम एशिया में शांति के नए दौर की शुरुआत हो सकती है।